अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय कला की चमक, घर‑घर में नीतिगत अंतराल
बॉलीवुड निर्माता करन जौहर ने जब 5 मई को न्यू यॉर्क के Met Gala कार्पेट पर कदम रखा, तो उनका पोशाक केवल फैशन नहीं, बल्कि भारतीय कला की एक जीवित अभिव्यक्ति थी। डिजाइनर ने भारतीय पंतभूषण और राजस्थानी कढ़ाई के संकेतों को आधुनिक सिल्हूट के साथ मिलाया, जिससे विदेशी मंच पर भारतीय सांस्कृतिक विरासत की एक झलक प्रस्तुत की गई। इस घटना ने एक तरफ भारत की कलात्मक उपलब्धियों को विश्व मानचित्र पर उभारा, तो दूसरी ओर कई प्रश्न चिह्न भी खड़े किए।
जब एक मशहूर व्यक्तित्व को विश्वीय मंच पर पहचान मिलती है, तो अक्सर यह प्रशंसा राष्ट्रीय स्तर पर कला‑संकल्पनाओं की अनदेखी को उजागर करती है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और बिहार के कई छोटे शिल्पकारों को सरकारी अनुदानों का अभाव, बुनियादी स्वास्थ्य‑सेवा और शिक्षा सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है। वहीँ, राष्ट्रीय संस्कृति मंत्रालय की वार्षिक बजट में भव्य अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए अल्पांश भाग ही कला‑विकास योजना को मिलता है।
इस असंतुलन की मूल वजह कई बार प्रशासनिक अकारणता और नीति‑निर्माण में प्राथमिकता‑संकट की होती है। सुविधा‑सूत्री पहलें अक्सर बड़े‑नाम वाले प्रोजेक्ट्स को आकर्षित करती हैं, जबकि ग्रामीण स्तर पर सस्ती जल‑टंकियों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या कला-शिक्षा के लिए बुनियादी संरचनाएँ अनदेखी रह जाती हैं। परिणामस्वरूप, एक ही साल में जहाँ एक भारतीय स्टार को विदेशी रेगिस्तान में रोशनी मिलती है, वहीं कई शिल्पकारों को अपने कार्यशाला में बिजली की कमी का सामना करना पड़ता है।
यह अंतर न केवल आर्थिक असमानता को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व की भी कमी को बताता है। जब सार्वजनिक बजट में ‘सांस्कृतिक चमक’ को प्राथमिकता दी जाती है, तो निचले स्तर की गरिमा‑भरी आवश्यकताओं – जैसे कच्चे पानी की सफाई, प्राथमिक स्कूलों में कला‑शिक्षा का समावेश, या स्वास्थ्य‑सिंचाई सुविधाएँ – को ठंडे आँचल में धकेल दिया जाता है। इस पर अभी तक कोई ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया है, जिससे जनता का भरोसा धीरे‑धीरे कमज़ोर हो रहा है।
करन जौहर की Met Gala उपस्थिति का सामाजिक प्रभाव दोधारी है: एक ओर यह भारतीय कला की अंतरराष्ट्रीय मान्यता को सुदृढ़ करता है, तो दूसरी ओर यह नीति‑निर्माताओं को चेतावनी देता है कि राष्ट्रीय स्तर पर समान समर्थन के बिना, कला केवल चमकते सितारों की सीमा में सीमित रहेगी, जबकि सच्चे शिल्पकारों की आवाज़ें अनसुनी रह जाती हैं।
Published: May 5, 2026