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UPSC प्रीलीम्स की अंतिम दो सप्ताह: तैयारी की दिशा‑निर्देश और प्रणालीगत कमियों पर प्रकाश
जैसे ही 2026 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा के प्रीलीम्स का दिन नजदीक आ रहा है, लाखों आशावादी उत्तरदाताओं को एक बार फिर से यह सवाल झनझनाता है कि अंतिम 15 दिनों में किस तरह की रणनीति अपनानी चाहिए। इस चरण में केवल ‘कितना पढ़ा’ नहीं, बल्कि ‘कब याद किया’ ही सफलता का निर्धारक बन जाता है।
पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को अब एक व्यावहारिक पाठ्यक्रम के रूप में माना जा रहा है। इस प्रयोगात्मक सिलेबस में बार‑बार दोहराए जाने वाले विषय, परीक्षा‑निर्माताओं की पसंदीदा पैटर्न और अवधारणात्मक नुक़्ते स्पष्ट होते दिखते हैं। इसलिए कई कोचिंग संस्थानों ने इस अवधि को ‘पिछला प्रश्न‑अभ्यास’ कहलाने वाले सत्र में बदल दिया है, जहाँ हर प्रश्न को पुनः प्राप्त करने की क्षमता पर ज़ोर दिया जाता है, न कि केवल सैद्धांतिक समझ पर।
हालांकि, इस ‘रिकॉल‑ऑफ़‑प्रेशर’ की माँग का मुद्दा अक्सर सामाजिक असमानता से जुड़ा रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अभ्यर्थी, जिनके पास सीमित इंटरनेट पहुँच, पुस्तकालय या अनुभवी मेंटर होते हैं, उन्हें समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल लगता है। वहीं, यूपीएससी द्वारा जारी केवल सिलेबस और परीक्षा‑तारीख के अलावा कोई व्यवस्थित मार्गदर्शन या तनाव‑प्रबंधन सुविधा नहीं दी गई है, जिससे कई को खुद ही “खुद का कोच” बनना पड़ता है।
इस परिस्थिति पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया भी न्यूनतम रही। उभरे प्रश्न यह है कि ऐसी राष्ट्रीय परीक्षा, जिसका सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में अहम स्थान है, के लिए क्या कोई व्यापक समर्थन तंत्र नहीं बनाया जा सकता? वर्तमान में सिर्फ शैक्षणिक सामग्री की उपलब्धता पर ध्यान दिया जाता है, जबकि अभ्यर्थियों के मनोवैज्ञानिक एवं लॉजिस्टिक जरूरतों को नजरअंदाज़ किया जाता है। यह धीरे‑धीरे एक ऐसी नीति‑खामी की तस्वीर पेश करता है, जहाँ सतह पर ‘परिक्षा‑सुविधा’ का दावा है, पर असली ‘सहायता’ की कमी स्पष्ट है।
सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर एक सामाजिक सीढ़ी का काम करता है; इसे पास करना अक्सर जीवन‑परिवर्तन का साधन बन जाता है। इस संदर्भ में, अंतिम दो सप्ताह की तैयारी न केवल व्यक्तिगत दृढ़ता का खेल है, बल्कि नीति‑निर्माताओं द्वारा प्रदान किए गए समर्थन‑सम्प्रदाय की भी परीक्षा है। यदि इस दबावपूर्ण अवधि में अभ्यर्थियों को उचित मार्गदर्शन, समय‑सारणी और मानसिक सहयोग नहीं मिलता, तो भविष्य में उचित प्रतिस्पर्धा की बात ही करना कठिन हो जाता है।
सारांश में कहा जा सकता है कि UPSC प्रीलीम्स की अंतिम पंधरह दिन की तैयारी में तीन बिंदु प्रमुख हैं: (i) पिछले वर्ष के प्रश्नों का व्यवस्थित विश्लेषण, (ii) स्थिर अवधारणाओं को वर्तमान घटनाओं के साथ एकीकृत करके संक्षिप्त पुनरावृत्ति, तथा (iii) तेज़ी से निर्णय‑लेने की क्षमता पर ध्यान। साथ ही, इस प्रक्रिया को सामाजिक-आर्थिक असमानताओं के बिना सुगम बनाने के लिए प्रशासनिक सहभागिता एवं संरचनात्मक समर्थन की तुरंत आवश्यकता है—क्योंकि जब परीक्षा का बोझ असमान रूप से बँटा रहता है, तो सिस्टम की वैधता भी प्रश्नचिह्न में फँस जाती है।
Published: May 9, 2026