NHRC ने शिक्षा मंत्रालय और राज्यों को निजी स्कूलों की महँगी किताबों पर नोटिस जारी, RTE मानदंडों की जांच का आदेश
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने आज शिक्षा मंत्रालय, केंद्रीय बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) और सभी राज्य शिक्षा विभागों को आधिकारिक नोटिस जारी कर, निजी माध्यमिक स्कूलों में महँगी निजी प्रकाशकों की पाठ्य‑पुस्तकों की प्रथा पर स्पष्ट जवाबदेही माँगी। यह कदम उन परिवारों की बढ़ती शिकायतों के बाद उठाया गया है, जो निराधार रूप से अपने बच्चों की झोली में अतिरिक्त भार देख रहे हैं।
राइट टू एजुकेशन (RTE) अधिनियम के अनुच्छेद 12(2) के तहत सभी स्कूलों को NCERT द्वारा प्रकाशित पुस्तकें अनिवार्य रूप से उपयोग करनी होती है। फिर भी कई निजी संस्थानों में शीर्ष स्तर के अभिभावकों से अतिरिक्त फीस लेकर निजी प्रकाशकों की महँगी किताबें पढ़ाने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा का बुनियादी अधिकार ढीला पड़ रहा है, जबकि उन्हें उच्चतम शैक्षणिक मानकों का दावा करना पड़ता है।
NHRC ने नोटिस में कहा कि यह प्रथा "असमानता की जड़ बनकर उभरी" है और तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए जाएँ। आयोग ने सभी प्रांतों से यह अनुरोध किया कि वे दो हफ्ते के भीतर अपने स्कूल‑बोर्ड के अनुपालन रिपोर्ट, पुस्तक सूची और कक्षा‑स्तर के मूल्य‑विवरन प्रस्तुत करें। साथ ही, स्कूल बैग नीति की भी जांच करने को कहा गया, क्योंकि महँगी किताबों के साथ‑साथ भारी बैग, बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डालते हैं।
परिचालन में इस तरह की चूक का असर केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रह जाता। कई परिवारों ने बताया कि अतिरिक्त पुस्तक लागत के कारण वे बच्चों की पोषण, स्वास्थ्य देखभाल या अतिरिक्त कोचिंग जैसे मौलिक जरूरतों पर खर्च घटा रहे हैं। सामाजिक असमानता का यह लूपरूप, जहाँ शिक्षा के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, धीरज के अंतिम चरण में पहुँच चुका है।
नए नोटिस के बाद कुछ राज्यों ने पहले से ही “भुगतान‑मुक्त NCERT‑केन्द्रित पाठ्यक्रम” को दोबारा लागू करने का इरादा जाहिर किया है, जबकि कई निजी स्कूली संघों ने कहा कि निजी पुस्तकों का चयन “अकादमिक बेहतरता” का परिणाम है, न कि ‘आधारभूत अधिकार’ का उल्लंघन। यह सुनहरी तर्कशक्ति दर्शाती है कि नीति‑निर्माता और शैक्षणिक संस्थाएँ अक्सर बौद्धिक बहस की चादर में आर्थिक सिद्धांतों को लपेट लेती हैं।
व्यंग्य की सीमा पार किए बिना कहा जा सकता है कि जब तक शासन व्यवस्था खुद को “जिम्मेदारी‑सेवा” के बजाय “जवाब‑देना‑पराय” के रूप में देखेगी, तब तक इस प्रकार की अनावश्यक लागतें बच्चों के भविष्य में बाधा बने रहेंगी। प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ NHRC की यह पहल, सार्वजनिक जवाबदेही का एक महत्त्वपूर्ण कदम है—परन्तु इसका असर तभी दिखेगा जब प्रत्येक राज्य अपना ‘रिपोर्ट‑ड्रiven’ कार्यन्वयन कर सकता है, न कि मात्र कागज पर नोटिस जारी कर।
शिक्षा के मौलिक अधिकार को पुनः सुदृढ़ करने और आरटीई मानदंडों की वास्तविक प्रवर्तन सुनिश्चित करने हेतु, यह सामाजिक मांग है कि ‘उच्च शिक्षण’ का अर्थ केवल महँगा टाइटल नहीं, बल्कि सभी के लिए सुलभ, स्वस्थ और न्यायसंगत सीखना हो।
Published: May 4, 2026