NEET 2026 में सुरक्षित अंकों की कथा: सीमित MBBS सीटों पर बढ़ती असमानता
राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NEET) ने इस साल भी युवा भारत की आशाओं को एक तीखे समीकरण में बदल दिया है। 620‑650 अंकों के आसपास के ‘सुरक्षित’ अंक दावे ने सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के संभावित द्वार दिखा दिया, जबकि आरक्षित श्रेणियों को थोड़ा कम अंक भी पर्याप्त लगते हैं। यह अंतर केवल आँकड़े नहीं, बल्कि मौलिक सामाजिक असमानता का प्रतीक है, जहाँ समान मेहनत पर भी वर्ग‑आधारित अंकभेद बना रहता है।
उच्च अंक हासिल करने के लिए आवश्यक दृढ़ता को देखते हुए, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यें इस वर्ष 1.2 लाख से अधिक उमेदवारों को जोड़ रही हैं, जबकि कुल सरकारी MBBS सीटें 78,000 के आसपास ही सीमित हैं। ऐसे परिदृश्य में, एक अंक का अंतर रैंक में सैकड़ों स्थानों का अंतर बन जाता है, जिससे कई छात्रों की आगे की पढ़ाई, मेडिकल कैरियर और यहाँ तक कि उनके परिवारों के आर्थिक भविष्य में खलल पड़ता है।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व की बात करें तो, राष्ट्रीय परीक्षण प्राधिकरण (NTA) ने परीक्षा की कठिनाई स्तर को ‘वर्ष के सबसे कठिन’ कह कर डॉक्टर बनने की राह को और भी दुर्जेय बना दिया। वहीं, शिक्षा मंत्री ने वार्षिक अभिलेखों में ‘सीटों की संख्या बढ़ाने’ का वादा किया, परंतु वास्तविकता में खुद राज्य स्तरीय काउंसिलों द्वारा जारी टॉप‑कोट पर सीमित सीटों की तालिका ही वही पुरानी कहानी दोहराती है। यह ‘रिपोर्ट‑संकट’ अक्सर बोझिल विनिर्देशों में उलझी रहती है, जबकि छात्रों की वास्तविक जरूरतों को नज़रअंदाज़ किया जाता है।
सभी वर्गों के लिए समान मानक स्थापित करने की नीति के अभाव से सामाजिक विभाजन और गहरा हो रहा है। आरक्षण के तहत वर्गीय कट‑ऑफ़ 470‑490 अंक के आसपास रहनी चाहिए, परन्तु कई राज्यें अपनी स्थानीय कट‑ऑफ़ मानकों को स्वतंत्र रूप से बदल कर असमानता को और गहरा कर रही हैं। इससे न केवल छात्र‑अभियान में भ्रम उत्पन्न होता है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी ‘हवा‑हवाई’ बन जाती है।
संदर्भ में, कई निजी संस्थानों ने 4‑5 लाख रुपये की अत्यधिक शुल्क लेकर सीमित ‘सीट‑प्लस’ की पेशकश की है। यह न केवल आर्थिक असमानता को बढ़ावा देता है, बल्कि स्वास्थ्य‑सेवा के सार्वजनिक उद्देश्य को ही ध्वस्त करता है, जहाँ ‘सस्ते मेडिकल शिक्षा’ का वादा केवल एक शब्द बन कर रह गया है।
स्थानीय स्तर पर, डी.एम.ए (डिजिटलीकरण एवं मेन्टेनेंस एजेंसी) ने मेडिकल प्रवेश पोर्टल में बार‑बार तकनीकी गड़बड़ी की रिपोर्ट की है, जिससे छात्रों को अपने दस्तावेज़ अपलोड करने या पेपर का परिणाम देखने में असुविधा होती है। इन तकनीकी मुद्दों को हल करने का अस्थायी ‘टिकट‑सिस्टम’ अधिक बोझिल हो गया, जबकि वास्तविक समाधान के लिए संस्थागत बदलाव की आवश्यकता है।
सारांशतः, NEET 2026 की ‘सुरक्षित अंक’ की कथा केवल अंक तालिका नहीं, बल्कि एक सामाजिक विमर्श की जरूरत को उजागर करती है—कि स्वास्थ्य‑शिक्षा का विस्तार केवल संख्या‑गुंजाइश नहीं, बल्कि समता‑पूर्ण नीति, पर्याप्त राज्य‑निधि और प्रशासनिक तत्परता की आवश्यकता रखता है। जब तक ये पहलू ठोस तौर पर नहीं बदलते, ‘एक अंक पर छूटना’ ही छात्र‑जनसंख्या के बड़े हिस्से के भविष्य की कहानी बनी रहेगी।
Published: May 3, 2026