FIFA के टिकेट महंगाई पर इन्फैंटिनो का बचाव, भारतीय दर्शकों के लिये सवाल
अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल महासंघ (FIFA) के अध्यक्ष जियानी इन्फैंटिनो ने 2026 के विश्व कप के टिकेटों की ‘आँख‑झाँक’ कीमतों को पूँजी‑ग्रोसरी की तरह ‘मांग‑पर‑आधारित’ बताया। यह बयान तब आया, जब विश्व भर के फुटबॉल प्रेमियों—विशेषकर भारत के लाखों धीरज‑भरे दर्शकों—को असहनीय दरों का सामना करना पड़ेगा।
इन्फैंटिनो का तर्क, जिसे उन्होंने ‘बाजार‑संबंधी वास्तविकता’ कहा, यह दर्शाता है कि महंगे टिकेट आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि सामाजिक समानता को पीछे धकेल रहे हैं। भारत में औसत मासिक आय से कहीं अधिक मूल्य पर वाणिज्यिक खेल समारोह में भागीदारी को न्यायोचित ठहराना, समाज‑विज्ञान की परिभाषा से परे है।
भारी कीमतों के परिणामस्वरूप कई भारतीय प्रशंसकों ने ऑनलाइन फ़ोरम और सामाजिक मीडिया पर विरोध प्रदर्शन किया, यह दर्शाते हुए कि वे अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं—स्वास्थ्य, शिक्षा, जल एवं बिजली—को टर्न‑ऑफ़ करने को तैयार नहीं हैं। इस पर FIFA ने कहा कि टिकेट‑बाजारी का उद्देश्य ‘ग्लोबली इवेंट को सस्टेनेबल बनाने’ के लिये फंड जुटाना है, परन्तु इस सस्टेनेबिलिटी की गणना में आम जनता को किनारे पर धकेलना, सार्वजनिक नीति में नई असमानता जोड़ता है।
देश के खेल विभाग ने अभी तक इस वैश्विक मूल्य‑नीति पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालाँकि, बजट‑निर्धारण में अक्सर ‘अन्य देशों के अनुभव’ को संदर्भ बनाकर विदेश‑आधारित खेलों में भारतीय उत्साही वर्ग के हितों को अनदेखा किया जाता है। इस प्रशासनिक चूक से यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय नागरिक संरचनात्मक सार्वजनिक सुविधा—जैसे कि सस्ती अंतरराष्ट्रीय खेल—के हकदार हैं या उन्हें केवल देख‑सुन कर ही संतुष्ट रहना पड़ेगा।
जैसा कि इन्फैंटिनो ने कहा, ‘डिमांड ही कीमत तय करती है’, परन्तु जब डिमांड खुद ही महंगाई की दीवार से धुंधली हो, तो क्या यह बाजार‑सिद्धांत नहीं बल्कि एक नज़रंदाज़ी बन जाता है? भारतीय प्रशंसकों के लिये यह स्थिति नीति‑निर्माताओं की एक चुभती हुई चुनौती बन गई है: केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के हितधारक बनकर इस असमानता को चुनौती देना पड़ेगा।
Published: May 6, 2026