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Category: समाज

CUET को प्राथमिकता, बोर्ड अंक द्वितीयक: प्रवेश नीति में बदलाव से छात्रों की आशा और चिंताएँ

साक्षरता के उच्च लक्ष्य और वार्षिक बोर्ड परीक्षाओं की धूमधाम के बीच, केंद्र सरकार ने एक नया शैक्षिक मोड़ खींचा है। दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय और अन्य प्रमुख संस्थानों ने अब प्रवेश के लिए बोर्ड मार्क्स की बजाय केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (CUET) को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। इस कदम को आधुनिकीकरण कहा गया है, पर वास्तविकता यह है कि यह बदलते समय के साथ जुड़ी पुरानी समस्याओं को नई रूपरेखा में ढाल रहा है।

पारंपरिक रूप से बोर्ड अंक ही विश्वविद्यालय में प्रवेश का मुख्य मानदंड रहा है, जिससे छात्रों पर निरंतर अंक‑हाई दबाव बना रहता था। नई नीति के तहत बोर्ड अंक केवल योग्यता फ़िल्टर बनते हैं, जबकि अंतिम चयन CUET के स्कोर पर निर्भर करता है। यह परिवर्तन उन छात्रों के लिए अवसर लाता है जिनके बोर्ड अंक औसत हैं परन्तु उन्होंने प्रवेश परीक्षा में कड़ी मेहनत करके उच्च अंक प्राप्त किए हैं। इस प्रकार, शैक्षिक असमानता का एक नया परिदृश्य उभरा है जहाँ परीक्षा‑उत्पादक कौशल को बोर्ड‑आधारित मौलिक ज्ञान से अधिक महत्व दिया जा रहा है।

नीति निर्माताओं ने इसे “समग्र मूल्यांकन” कहा है, पर प्रशासनिक जड़त्व की बात अलग है। जबकि CUET की तैयारी के लिए निजी ट्यूशन और ऑनलाइन कोर्सों की माँग में तेज़ी से वृद्धि हुई है, इससे छात्रों की आर्थिक स्थितियों के अंतर स्पष्ट हो रहे हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है, जिसका बोझ अक्सर शिक्षा‑संबंधी ऋणों में बदल जाता है। इस प्रकार, विशेष रूप से ग्रामीण और गरीब क्षेत्रों के छात्रों के लिए यह कदम अनजाने में सामाजिक असमानता को और गहरा कर सकता है।

शिक्षा विभाग ने कहा है कि यह कदम “समान अवसर” प्रदान करेगा, पर वास्तविकता यह है कि नीतियों की कार्यान्वयन में अक्सर दो‑तीन कदम आगे ही हिचकिचाहट दिखती है। बोर्ड के परिणाम अभी जारी नहीं हुए हैं, फिर भी विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव की घोषणा ने छात्रों को अनिश्चितता में डाल दिया है। कई अभिभावकों ने यह सवाल उठाया है कि क्या बोर्ड परिणाम को केवल पात्रता मानदंड बनाकर छात्रों को एक अतिरिक्त ‘फ़िल्टर’ से गुजारना नीतिगत अनुपालन की कमी नहीं दर्शाता? प्रशासन ने इस पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण नहीं दिया, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी स्पष्ट हो रही है।

उपरोक्त बदलाव का सबसे बड़ा सामाजिक असर यह है कि अब शैक्षणिक उपलब्धियों को मात्र अंक‑आधारित नहीं, बल्कि परीक्षा‑कुशलता द्वारा मापा जाएगा। यह दिशा-निर्देश कुछ छात्रों को नई आशा दे सकता है, परन्तु व्यापक स्तर पर यह पूछना आवश्यक है कि क्या यह नीति शिक्षा के मूल उद्देश्य—समान, समावेशी और गुणात्मक सीखना—को साकार कर रही है, या केवल प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा‑परिप्रेक्ष्य को और सुदृढ़ कर रही है। उत्तरदायित्वपूर्ण प्रशासनिक कदमों के बिना यह परिवर्तन केवल एक आदर्श वाक्य बनकर रह सकता है।

Published: May 3, 2026