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Category: समाज

45‑वर्षीय मिलेनियल और 60‑वर्षीय जेन‑एक्स की दीर्घायु योजना में सरकारी चूक स्पष्ट

भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव तेज़ी से घटित हो रहे हैं। सबसे हालिया आँकड़े दर्शाते हैं कि सबसे बड़े मिलेनियल अब 45 वर्ष के हो चुके हैं, जबकि जन‑एक्स वर्ग 60 की उम्र तक पहुँच गया है। यह नई आयु‑सीमा न केवल खुद के जीवन‑लंबी की योजना बनाने की चुनौती पेश करती है, बल्कि सार्वजनिक नीति, स्वास्थ्य‑सेवा और सामाजिक सुरक्षा की दक्षता का भी परीक्षण करती है।

एक हालिया डिजिटल टूल ने इस आयु‑समूह को केवल बचत‑पर‑आधारित योजना से आगे निकल कर स्वास्थ्य, कौशल पुनःप्रशिक्षण, देखभाल‑भत्ता और मानसिक‑सुविधा जैसे कारकों को भी मापने का प्रस्ताव रखा है। टूल का उद्देश्य व्यक्तियों को यह समझाना है कि दीर्घायु केवल बैंक बैलेन्स नहीं, बल्कि व्यापक जीवन‑गुणवत्ता का प्रतिबिंब है।

हालाँकि, इस पहल की सफलता भारत की मौजूदा प्रशासनिक ढांचे पर निर्भर करती है—एक ढांचा जिसे अक्सर 1990‑के दशक की पेंशन‑नीति और स्वास्थ्य‑बजट के बंधन में फँसा देखा जाता है। राजस्व‑सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा पेंशन और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (AB‑PMJAY) अभी भी आयु‑समूह‑विशिष्ट डेटा के बिना कवरेज का अनुमान लगाते हैं, जिससे नस्ल‑परिवर्तन की वास्तविक आवश्यकताएँ अनदेखी रह जाती हैं।

समानता के प्रश्न भी सामने आते हैं। शहरी मध्यम‑वर्ग के मिलेनियल के पास इंटरनेट‑आधारित टूल तक पहुँच है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी और स्वास्थ्य‑सेवा केंद्रों की दूरस्थता इन लाभों को व्यावहारिक रूप से निरर्थक बना देती है। इस असमानता को केवल ‘आर्थिक जागरूकता’ के शब्द में समेटना नीति‑निर्माताओं की कमियों को और गहरा कर देता है।

शिक्षा एवं पुनः‑प्रशिक्षण की बात करें तो कई राज्य अभी भी पुरानी कौशल‑निपुणता प्रमाणपत्रों पर निर्भर हैं। एक ओर जहाँ कामकाजी उम्र के दो दशकों बाद लोगों को नई तकनीकी आवश्यकताओं से तालमेल बिठाना पड़ता है, वहीँ ‘आयु‑सांकेतिक रोजगार योजना’ की कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं है। इस विफलता को सरकार अक्सर ‘बजटीय प्रतिबंध’ के नाम पर टाल देती है, जबकि निजी‑क्षेत्र के जलवायु‑परिवर्तन‑संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिये सब्सिडी खुली रहती है।

नियंत्रित व्यंग्य के साथ कहा जाए तो, भारत में सामाजिक सुरक्षा की ‘रकम’ अब भी वही पुराने फॉर्म 1947‑के ‘आवासीय पेंशन’ के टेम्प्लेट पर आधारित है। जहाँ नागरिकों को सुगम जीवन‑जात्रा के लिये बहु‑आयामी योजना चाहिए, वहीँ नीति‑निर्माता ‘एक ही फ़ॉर्म पर साइन‑ऑन’ को ही समाधान समझते हैं।

समग्र रूप से, 45‑वर्षीय मिलेनियल और 60‑वर्षीय जन‑एक्स की दीर्घायु की तैयारी में व्यक्तिगत पहल सराहनीय है, पर इसका वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब सार्वजनिक नीतियों में स्वास्थ्य‑भुगतान, पेंशन‑सुधार और डिजिटल‑साक्षरता को समग्र रूप से अद्यतन किया जाए। तभी इस जनसांख्यिकीय बदलाव को केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि सशक्त और समावेशी सामाजिक लेन‑देने का अवसर माना जा सकेगा।

Published: May 4, 2026