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15 साल के किशोर ने कचरे को हाई‑फ़ैशन में बदल दिया, भारत में टिकाऊ शैली की नई लहर
इथियोपिया के 15‑साल के डिजाइनर कलू पुटिक ने सोशल मीडिया पर ऐसी शैली पेश की है जो कचरे को एक नई पहचान देती है। उसने फेक प्लास्टिक, फटे हुए कपड़े और अन्य बंज़र को हाई‑फ़ैशन आउटफिट में बदल कर इंस्टाग्राम पर करोड़ों व्यू और लाखों फॉलोअर्स हासिल किए। इस घटना ने भारत में भी समान प्रयोग‑प्रयोग को प्रेरित किया और मौजूदा कचरा‑प्रबंधन प्रणाली में मौन रूप से लिखी गई कई खामियों को उजागर किया।
वर्तमान में भारत प्रतिदिन लगभग 62 मिलियन टन कचरा उत्पन्न करता है, लेकिन संग्रहण‑विच्छेदन के मानकों में निरंतर असंगतियां बनी हुई हैं। शहर‑शहर में कूड़ादानों में मिश्रित कचरा जमा रहता है, जिससे न केवल पर्यावरणीय क्षति होती है बल्कि आर्थिक अवसरों का भी दँव हो जाता है। कलू की रचनाएँ इस व्यर्थ संसाधन को पुनः उपयोग योग्य वस्तु में परिवर्तित करने का एक व्यावहारिक उदाहरण पेश करती हैं।
किशोर वर्ग, जो अक्सर शिक्षा‑सेवा‑रोजगार की त्रिपक्षीय चुनौतियों में फंसा रहता है, ऐसे नवाचारों से प्रेरित हो रहा है। कई स्कूलों में अब सर्कुलर इकोनॉमी पर विशेष पाठ्यक्रम जोड़ने की मांग की जा रही है, जबकि मौजूदा शैक्षणिक ढाँचे में व्यावहारिक कौशल प्रशिक्षण दुर्लभ है। इस अंतर को भरने के लिए नीतियों में ठोस पहल की आवश्यकता है, न कि केवल शब्दों‑के‑साथ कथन‑के‑बात।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो, कई नगरपालिकाएँ कचरे को ‘अवांछित’ कहकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं, जबकि वही कचरा grassroots‑level नवाचार को पनपने का आधार बन सकता है। व्यावसायिक प्रशिक्षण, माइक्रो‑फाइनेंस और डिज़ाइन‑इन्क्यूबेशन के लिए स्पष्ट दायरे की कमी इस बात का संकेत है कि नीति‑निर्माताओं ने ‘कचरा‑से‑फ़ैशन’ जैसे विचारों को सिर्फ ट्रेंड के रूप में खारिज कर दिया है।
कलू की वायरल यात्रा एक संकेत है—डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों ने युवा प्रतिभा को वैश्विक दर्शकों से जोड़ दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि भारत में समान अवसरों के लिए संरचनात्मक समर्थन अभी भी अधूरा है। यदि कचरा‑प्रबंधन को केवल सफाई‑संतोषी काम माना जाता है, तो इस कच्चे पदार्थ को रचनात्मक निचोड़ में बदलने वाले युवाओं को कौन सराहेगा? एक समाधान‑उन्मुख प्रशासन वही होगा जो न सिर्फ कूड़ादानों को भरने वाले थैलों को कम करे, बल्कि उन थैलों से बने कपड़े को फैशन‑शो के रैंप पर उतारे।
सारांश में, 15‑साल के इस युवा ने दिखा दिया है कि कचरा भी एक मूल्यवान संसाधन बन सकता है, बशर्ते नीति‑निर्माण, शिक्षा‑प्रणाली और स्थानीय प्रशासन मिलकर इसे पोषित करें। जब तक कचरे को ‘बर्बाद’ शब्द में सीमित रखा जाएगा, तब तक ऐसी रचनात्मक पहलें केवल सोशल मीडिया के ‘वायरल’ सेक्शन में ही रह जाएँगी, न कि वास्तविक सामाजिक परिवर्तन की धारा में।
Published: May 9, 2026