हॉरमुझ जलमार्ग में 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' को लेकर अमेरिकी सेना का दावा: भारत की विदेश नीति पर नई परीक्षा
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के एक प्रवक्ता ने कहा कि खाड़ी में बंद हो चुके हॉरमुझ जलमार्ग में "प्रोजेक्ट फ्रीडम" की पहली कार्रवाई अब शुरू हो गई है। इस मिशन का उद्देश्य क्षेत्रीय शिपिंग को सुरक्षित कराना और तेल व गैस के प्रवाह को फिर से स्थापित करना बताया गया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बात को "एक अंतरराष्ट्रीय maritime सुरक्षा पहल" कहा, परंतु प्रत्यक्ष टिप्पणी में इस अमेरिकी कदम के रणनीतिक इरादों पर प्रश्न उठाए।
भारत की वर्तमान सरकार, जो बहुपक्षीयता और रणनीतिक स्वायत्तता की घोषणा करती है, इस विकास को दोहरा जुआ मान रही है। कुछ नियोजित सुरक्षा गठबंधन पहलें, जैसे समुद्री ड्यूटी-फ्री ज़ोन का प्रस्ताव, अभी भी संसद में टिका-टिकी चर्चा के दौर में हैं। जबकि भारत ने आधिकारिक तौर पर हॉरमुझ पर आर्थिक प्रतिबंधों के उठाने का समर्थन नहीं किया है, सरकार ने कहा कि यह "राष्ट्रीय हितों के अनुरूप" रहेगा।
विपक्षी दलों ने तुरंत इस पर सवाल उठाए। प्रमुख विपक्षी नेता ने कहा कि "अमेरिकी सेना की इस तरह की सैन्य पहल भारत को अनावश्यक जोखिम में डाल रही है" और संसद में एक विशेष प्रश्न उठाने की मांग की। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने ग्लोबल ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे को घरेलू ऊर्जा कुप्रबंधन और तेल की कीमतों के बढ़ते बोझ से तटस्थ नहीं किया है।
उसे देखते हुए, कई नीति विश्लेषकों ने इस बात की ओर इशारा किया कि यदि हॉरमुझ में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति बढ़ती है तो यह भारत के strategic autonomy की दावेदारी के साथ टकरा सकता है। विशेष रूप से, इरान के साथ चल रही कूटनीतिक बातचीत में इस प्रकार की बाहरी सैन्य कार्रवाई को भारत के लिए कूटनीतिक दायरे में कठिनाई पैदा कर सकती है।
विधानसभा के आगामी चुनावों के संदर्भ में यह विकास एक नई राजनीतिक बहस का कारण बन रहा है। सरकार के दावे कि वह "कुशल कूटनीति" और "स्थिर ऊर्जा आपूर्ति" सुनिश्चित कर रही है, विपक्ष के इसँसिएशन को "स्थिरता से अधिक अल्पकालिक सुरक्षा" के रूप में देख रहा है। मतदाता भागीदारी को प्रभावित करने वाले इस मुद्दे पर जनमत सर्वेक्षणों में दर्शाया गया है कि जनता को ऊर्जा कीमतों और सुरक्षा दोनों की चिंता है, परन्तु कोई स्पष्ट पक्ष नहीं दिखाई देता।
नीति स्तर पर, भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति अभी भी अधूरी प्रतीत होती है। जबकि सरकार ने देश के नीले पानी में सुरक्षा को "सहयोगी" कह कर उल्लेख किया है, इस अज्ञात सैन्य मिशन के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाई है। आलोचक तर्क देते हैं कि केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि प्रभावी डिप्लोमैटिक चैनलों और स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
अंततः, हॉरमुझ में अमेरिकी "प्रोजेक्ट फ्रीडम" की शुरुआत न केवल मध्य पूर्वीय ऊर्जा गतिशीलता को बदल रही है, बल्कि भारत की विदेश नीति की निरंतरता, प्रशासनिक जवाबदेही और चुनावी वादों के परीक्षण का नया मंच भी बन गई है। सार्वजनिक हित के सवाल — ऊर्जा की स्थिरता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक स्वतंत्रता — इस बहस के केंद्र में बने रहेंगे।
Published: May 6, 2026