होरमुज़ नहर ब्लॉकएड की संभावनाओं पर भारत की नीति पर सवाल
समुद्र नियंत्रण को युद्ध की सबसे पुरानी रणनीति माना जाता है: समुद्री मार्ग को बंद कर दुश्मन की आपूर्ति रोक कर जीत हासिल की जाती है। इस सिद्धांत के तहत स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को आधुनिक समय का सबसे संवेदनशील जलमार्ग माना जाता है, जहाँ कोई भी ब्लॉकएड वैश्विक तेल‑प्रोडक्ट की कीमतों को झटका दे सकता है। इस पर भारत की विदेशनीति, रक्षा नीति और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा‑निर्देशों को अब गंभीरता से परखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री के कार्यालय ने हाल ही में जारी एक बयान में कहा कि भारत “होरमुज़ नहर के किसी भी संभावित प्रतिबंध के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए सामरिक तैयारियों को तेज़ कर रहा है” और भारतीय नौसेना “पर्याप्त जहाज़ों, ड्रोनों और उन्नत रडार सिस्टम से लैस है”। सरकार ने यह भी जोड़ा कि भारत अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ मिलकर “समुद्री मुक्त ट्रांसपोर्ट” सुनिश्चित करेगा।
इन दावों को विरोधी दलों ने तुरंत चुनौती दी। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीडी) के प्रमुख नेताओं ने तर्क दिया कि सरकार का यह आश्वासन “जटिल भू‑राजनीतिक जोखिमों को सुलझाने में केवल शब्द‑खेल है” और “ऊर्जा‑संकट के वास्तविक परिदृश्य को नहीं दर्शाता”। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पिछले दो दशकों में तेल आयात पर निर्भरता बढ़ी है, जबकि घरेलू वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की विकास गति बहुत धीमी रही।
विरोधियों के अनुसार, सरकार ने पिछले वर्ष में जारी किए गये “डिज़ेल सॉलिडैरिटी स्कीम” को केवल “रुप‑रुपी जनसंपर्क” कहा जा रहा है, जबकि वास्तविक उपाय—जैसे निजी जहाज़ों की सुरक्षा, बहु‑रूट ट्रेड लाइन्स की योजना, और तेल भंडारण क्षमता में स्थायी बढ़ोतरी—अब तक किसी विशिष्ट रूप में लागू नहीं हुए। इस सन्दर्भ में एक संसदीय प्रश्नपत्र पर “आपूर्तिकर्ता देशों के साथ वैकल्पिक रूटिंग की प्रक्रिया अभी भी प्रारम्भिक चरण में है” जैसा उत्तर आया, जिससे प्रश्न उठता है कि क्या सरकार का रणनीतिक तैयारियों का दावा मात्र “स्लाइड‑डेक” पर लिखा हुआ है या वास्तविकता में लागू है।
यह मुद्दा सिविल सोसाइटी और उद्योग जगत के बीच भी तर्क-वितर्क का केंद्र बना हुआ है। भारतीय तेल निगम (आईओसी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि “होरमुज़ में संभावित ब्लॉकएड से निपटने के लिए हमें जटिल लॉजिस्टिक मॉडल तैयार करने की जरूरत है, जिससे सीमित मूल्य‑वृद्धि और आपूर्ति‑स्थिरता दोनों सुनिश्चित हो सके”। हालांकि, वैद्युत‑ऊर्जा मंत्रालय ने अभी तक इस दिशा में कोई विस्तृत नीति दस्तावेज़ नहीं जारी किया है, जिससे “नीति‑विराम” की लकीर स्पष्ट होती है।
आगामी लोकसभा चुनाव के समीप आते हुए, विपक्ष ने इस मुद्दे को “ऊर्जा‑सुरक्षा का चुनावी हथियार” बना दिया है। कई विधानसभा क्षेत्रों में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में मौसमी गिरावट के बावजूद, अस्थायी उपायों की निरंतरता को लेकर जनसंख्या में असंतोष दिख रहा है। मतदान के माहौल में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सरकार न केवल “समुद्री सुरक्षा बैनर” को तलवार के रूप में दिखा रही है, बल्कि घरेलू ऊर्जा सुदृढ़ता के मूलभूत कारणों को भी छुपा रही है।
नीति‑विश्लेषकों का मानना है कि भारत को दो‑स्तरीय रणनीति अपनानी चाहिए: एक, राष्ट्रीय स्तर पर “पुनर्योजी ऊर्जा एवं घरेलू रिफाइनरी क्षमता” को तेज़ी से बढ़ाना; दूसरा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “बहु‑रूपी समुद्री गठबंधन” के माध्यम से हेराफेरी‑रोधी मार्ग स्थापित करना। तभी कोई भी ब्लॉकएड, चाहे वह होर्मुज़ में हो या अन्य प्रमुख जलमार्गों में, राष्ट्रीय हितों को गंभीर रूप से खतरे में न डाल पाएगा। इस बीच, सरकार के मौजूदा दावों और विपक्ष के प्रश्नों के बीच की खाइयां यह स्पष्ट करती हैं कि नीतिगत जवाबदेही के बिना केवल घोषणा‑परिचालन ही स्थायी समाधान नहीं बन सकता।
Published: May 3, 2026