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Category: राजनीति

होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण: भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल

ईरान ने हाल ही में अपने रणनीतिक महत्व वाले होरमुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बनाए रखने की इच्छा दोहराई है, यह बयान केवल मैटरनल रहस्य नहीं बल्कि अमेरिका के साथ चल रहे वार्ता में बेमिसाल लीवर के रूप में पेश किया गया है। भारतीय नीति‑निर्माताओं के लिये यह विकास दोहरी चेतावनी लेकर आया है – एक तरफ विश्व तेल बाजार में संभावित व्यवधान, दूसरी तरफ सुरक्षा‑राजनीति के जटिल चक्र।

होरमुज विश्व के सबसे व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है; यहाँ से दैनिक 20 % से अधिक वैश्विक तेल और लगभग 30 % गैस गुजरती है। ईरान का इसका स्पष्ट दावा, जो कि शताब्दी‑पुराने जलडमरूमध्य की मंजूरी‑भवन में अपना मोड रखता है, उसके पास अब बग़ैर किसी अंतरराष्ट्रीय वार्ता के, इस बिंदु को आर्थिक शर्त या सैन्य ताकत के रूप में प्रयोग करने की स्वीकृति मिल गई है। यह नीति, जबकि ईरानी निर्वाचित सरकार की घरेलू लोकप्रियता बढ़ाने में मदद कर सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई धुंधली लकीरें खींचती है।

भारत, जो कुल आयातित तेल का 80 % से अधिक समुद्री मार्ग से लाता है, इस परिप्रेक्ष्य में अपनी ऊर्जा‑सुरक्षा को पुनःपरिकल्पित करने के दबाव में है। पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने लगभग 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन कोरियाई जलडमरूमध्य तथा होरमुज से हासिल किया। यदि ईरान इस जलडमरूमध्य को बंद या प्रतिबंधित करने की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो इसका तत्काल असर भारत के तेल‑कीमत, मौजूदा भंडारण और उद्योग‑व्यापी उत्पादन लागत पर पड़ेगा।

नई दिल्ली ने कूटनीतिक स्तर पर तटस्थता का नाटक किया है। प्रधानमंत्री के कार्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा, “भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों और स्वच्छ व्यापार के सिद्धांतों का दृढ़ता से समर्थन करता है। हम सभी पक्षों से पूछते हैं कि वे शांति, स्थिरता और मुक्त जहाजगमन को बनाए रखें।” यह बयान, जाहिर तौर पर, अमेरिकी दबाव के जवाब में दिया गया था, क्योंकि वाशिंगटन ने ईरान पर बहु‑आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। हालाँकि, विपक्षी दलों ने इस नीतिगत संतुलन को “राजनीतिक तटस्थता की एक बुरी तरह की व्याख्या” कर आलोचना की। कांग्रेस नेता ने कहा, “होरमुज पर ईरान का दावाबाज़ी सिर्फ भारत के ऊर्जा‑संकट को बढ़ाने का एक चक्र है, और सरकार को इस जोखिम को कम करने के लिए वैकल्पिक मार्गों, जैसे कि दक्षिण‑पूर्व एशिया के समुद्री पोर्ट्स, पर तत्काल विचार करना चाहिए।”

चुनावी संदर्भ में यह मुद्दा और जटिल हो जाता है। 2026 के लोकसभा चुनावों में कई प्रमुख दल, विशेषकर विरोधी गठबंधन, ईरान की इस ‘हड़ताल’ को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न के रूप में उठाएंगे। उनका तर्क रहेगा कि मौजूदा सरकार ने तेल‑आपूर्ति की असुरक्षा को लेकर पर्याप्त रणनीतिक डिप्लोमेसी नहीं दिखाई, जबकि विपक्ष ने संभावित वैकल्पिक मार्गों – जैसे कि ओमान के राफाह, मलेशिया के पुर्ट कालेंग या अफ्रीकी किनारों पर नया टर्मिनल – के विस्तार की मांग रखी है।

इसी बीच, रक्षा मंत्रालय ने इंडो‑पैक्ट के तहत अपने नौसेना के दो वैरहंट वर्ग के युद्धपोत को गल्फ़ में तैनात किया है, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता में स्पष्ट वृद्धि हुई है। हालांकि, नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि “होरमुज की जलडमरूमध्य में किसी भी संभावित संघर्ष का प्रभाव सिर्फ जलसंधिक ही नहीं, बल्कि तेल तथा गैस की निरंतर आपूर्ति पर भी पड़ेगा, और इसके लिये हमें बहु‑स्तरीय अनुक्रम विकसित करने की आवश्यकता है।”

समग्र तौर पर, ईरान का होरमुज पर नियंत्रण न रखने का मनोवैर्य एक रणनीतिक खेल के रूप में देखना चाहिए, जहाँ फ़ौज‑राजनीति को आर्थिक लाभ के साथ जोड़ कर पेश किया जा रहा है। भारत के लिए यह एक चेतावनी है – कि ऊर्जा सुरक्षा केवल घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक स्रोतों से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य की स्थिरता से भी जुड़ी है। सरकार की इस दिशा में नीतिगत तत्परता, विपक्षी की जांच‑परख और जनता की जागरूकता मिलकर ही इस जटिल जाल को सुलझा पाएगी।

Published: May 5, 2026