हॉर्मुज़ में अमेरिकी सुरक्षा गुंबद, भारत की ऊर्जा‑सुरक्षा पर सवाल
संयुक्त राज्य के नई रक्षा प्रमुख जॉन हेगसेथ के बयान के अनुसार, अमेरिका ने हॉर्मुज़ में जहाजों के लिए एक "सुरक्षा गुंबद" स्थापित कर दिया है। यह कदम यू‑ईरान वार्ता में विद्यमान शत्रुता‑विराम को बनाए रखने के तहत उठाया गया, पर वास्तव में इस क्षेत्र में नौवहन अभी भी जाम है।
हॉर्मुज़, जो विश्व तेल के सबसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में से एक है, में जहाजों का ठहराव भारत की ऊर्जा‑आवश्यकता को सीधे प्रभावित करता है। भारत के अधिकांश तेल आयात इस संकरी जलमार्ग से गुजरते हैं, और देरी से कीमतों में अस्थिरता तथा टैंकरों के बढ़ते बीमा प्रीमियम देखे जा रहे हैं।
दिल्ली ने अभी तक इस अमेरिकी सुरक्षा पहल पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, पर विपक्षी दलों ने सरकार को प्रश्नावली में उलझा दिया है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रमुख विरोधी नेता राकेश शाह ने कहा, "अमेरिका का स्वयं का सुरक्षा गुंबद बनाना हमारे राष्ट्रीय हितों को कमजोर करता है, जबकि भारत को अपने समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करने वाली स्वायत्त रणनीति बनानी चाहिए।"
केंद्रीय सरकार ने पूर्व में कहा था कि वह मध्य पूर्व में स्थिरता के लिए "राजनीतिक हल" खोजेगी और भारतीय व्यापारिक हितों की सुरक्षा के लिए "बहुपक्षीय सहयोग" को प्राथमिकता देगी। परन्तु इस बयान के बाद भी हॉर्मुज़ में जहाजों के ठहराव का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं दिखा। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी एकतरफ़ा सुरक्षा कवच, जो केवल अमेरिकी नौसेना और गठबंधनों पर निर्भर है, उस क्षेत्र के कई छोटे राष्ट्रों के हितों को नज़रअंदाज़ करता है।
विपक्ष ने इस अवसर का उपयोग कर भारत के मिशन-शिपिंग सुरक्षा ढांचे को राष्ट्रीय कांग्रेस में पेश करने की कोशिश की है। कांग्रेस के सचिव रजत सिंह ने कहा, "हॉर्मुज़ में ठहराव ने हमें यह सिखाया है कि हमें अपने स्वयं के एंटी‑पायरिटिक सिस्टम, समुद्री खुफिया नेटवर्क और तेज़ प्रतिक्रिया क्षमता को विकसित करना होगा, न कि विश्व पावर की छत्रछाया में भरोसा करना चाहिए।"
दूसरी ओर, रक्षा मंत्रालय ने बताया कि भारत ने पहले ही अपने जलदुर्गों को हॉर्मुज़ के निकटवर्ती जल सीमा में बढ़ाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं, और भारत के अंतर्राष्ट्रीय तेल कंपनियों को वैकल्पिक रूट, जैसे सिएरा लेओन के बंदरगाहों, को अपनाने के लिए निर्देशित किया गया है। परन्तु इस तरह की प्रतिक्रियाओं में समय लगना और लागत बढ़ना, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भरोसे को कम कर रहा है।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि US‑Iran निरस्त्रीकरण वार्ता विफल हो जाती है, तो हॉर्मुज़ में पूर्ण बंद हो सकता है, जिससे ऊर्जा कीमतों में उछाल और भारतीय आयातकर्ता कंपनियों में गंभीर व्यवधान पैदा होगा। इस स्थिति में न केवल व्यापारिक बिचौलियों, बल्कि आम जनता भी अस्थिरता का सामना करेगी।
संपूर्ण रूप से, हॉर्मुज़ में अमेरिकी सुरक्षा गुंबद ने अंतरराष्ट्रीय शांति की घोषणा के बावजूद एक व्यावहारिक समस्या को उजागर किया है — वह है भारत की ऊर्जा‑सुरक्षा की निरंतर असुरक्षा। यह मुद्दा अब केवल कूटनीति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और राजनीतिक जवाबदेही का क्षेत्र बन चुका है। सरकार को इस जटिल परिदृश्य में नीतिगत स्पष्टता और तेज़ कार्यवाही दिखानी होगी, नहीं तो "सुरक्षा गुंबद" शब्द केवल कागज़ी बयान ही रह जाएगा।
Published: May 5, 2026