हॉर्मुज़ जलमार्ग में सुरक्षा अनिश्चितता पर भारतीय जहाज़ों की चेतावनी
ग्लोबल तेल और गैस की धारा को नियंत्रित करने वाले हॉर्मुज़ जलमार्ग में अब एक नई चेतावनी सुनाई दी है। भारतीय कमर्शियल जहाज़ कप्तान रमन कपूर ने कहा, "जब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, कोई भी जहाज़ इस जलमार्ग को जोखिम में नहीं डाल सकता।" उनका यह बयान न केवल समुद्री उद्योग के मौजूदा जोखिम को उजागर करता है, बल्कि भारत की विदेश नीति और समुद्री सुरक्षा रणनीति पर भी प्रश्न चिह्न लगा देता है।
हॉर्मुज़ जलमार्ग में हाल ही में बढ़ती तनावपूर्ण स्थितियों के बीच, यूएस‑इरान, इज़राइल‑इरान, और यमन‑हौथी समूहों के बीच अस्थिरता ने समुद्री व्यापार को जोखिमपूर्ण बना दिया है। इस संदर्भ में, भारतीय समुद्री पोर्ट अफ़िस और रक्षा मंत्रालय ने कई बार मापदंड तय किए हैं—जैसे कि एंटी‑टॉरपेडो ड्रोन तैनात करना और अंतरराष्ट्रीय सामरिक गश्ती में भागीदारी—परन्तु इन उपायों की व्यावहारिक प्रभावशीलता अभी तक स्पष्ट नहीं हुई।
सत्ता पक्ष ने इस मुद्दे को "भारी जाँच" का कारण बताते हुए कहा कि भारत के शिपिंग कंपनियों को आवश्यक सुरक्षा कवच मिलने पर ही जलमार्ग पार करने का निर्देश दिया जाएगा। परन्तु विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और ए.डब्ल्यू.ए.पी., ने इस ब्योरे को "सरकारी जड़ता" का प्रमाण बताया। उन्होंने पूछा कि अगर भारत ने अपने मुख्य तेल आयातकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाई, तो विदेश में आर्थिक हितों की रक्षा के लिए किस तरह की रणनीति अपनाई जाएगी।
कप्तान कपूर के शब्दों में एक सूक्ष्म विरोधाभास भी निहित है—"कोई जहाज़ हीरो नहीं बनना चाहिए"। यह कथन सरकार के उन दावों को चुनौती देता है, जिनमें कहा जाता है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों में सुरक्षित और भरोसेमंद सहयोगी बन चुका है। वास्तविकता में, बड़ी क़ीमत पर व्यापारियों को जोखिम उठाना पड़ रहा है, और वही जोखिम अक्सर राष्ट्रीय नीति में गड़बड़ी के कारण उत्पन्न होते हैं।
नीति‑प्रभाव की दृष्टि से, इस चेतावनी का सबसे बड़ा असर भारत के ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा। हॉर्मुज़ से आयातित कच्चे तेल का लगभग 30% हिस्सा भारत की कुल आयात में योगदान देता है। यदि इस मार्ग को अस्थायी रूप से बंद करने की जरूरत पड़ती है, तो देश को वैकल्पिक स्रोत खोजने या रणनीतिक तेल भंडार में इजाफा करने के लिए तेज़ी से कदम उठाने पड़ेंगे। इस स्थिति ने मौजूदा ईंधन कर सुधार योजना और वैकल्पिक ऊर्जा नीति को भी तनाव में डाल दिया है।
सार्वजनिक हित के सवाल भी सामने आए हैं। समुद्री सुरक्षा के अभाव में जहाज़ों के संचालन में देरी, माल की कीमत में वृद्धि, और संभावित नौकायन दुर्घटनाएँ सामान्य नागरिक को सीधे प्रभावित करेंगी। यह असुरक्षा की धारा न केवल व्यापार को बल्कि भारत के निर्यात‑आयात पर निर्भर छोटे उद्योगों और उपभोक्ताओं को भी प्रभावित करेगी।
भविष्य की राह स्पष्ट नहीं है। जबकि भारत का रक्षा मंत्रालय नई नौसैनिक पनडुब्बियों और लेज़र प्रणाली के अतिरिक्त आधुनिकीकरण की घोषणाएँ कर रहा है, समय अभी यह तय करेगा कि ये उपाय वास्तविक रूप में किस हद तक जलमार्ग की सुरक्षा को सुदृढ़ करेंगे। इस बीच, रमन कपूर की चेतावनी एक स्पष्ट संकेत बन गई है कि बिना ठोस सुरक्षा बंधन के अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर जोखिम उठाना अब राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि व्यावहारिक अस्वीकृति बन चुका है।
Published: May 4, 2026