हॉर्मुज़ जलमार्ग के घमासान से एशिया‑पैसिफिक में सर्वव्यापी युद्ध का खतरा
अमेरिका और ईरान दोनों ही हॉर्मुज़ जलमार्ग को रणनीतिक महत्त्व का क्षेत्र मानते हुए समझौते से पीछे हट रहे हैं। दोनों पक्षों की कठोर रुख से गलती की संभावना बढ़ रही है, जिससे न केवल मध्य‑पूर्व बल्कि एशिया‑पैसिफिक तथा पूरे विश्व की सुरक्षा दशा अस्थिर हो सकती है।
हॉर्मुज़ विश्व तेल का लगभग पांच प्रतिशत तथा विश्व के लगभग तीन‑चतुर्थांश तेल निर्यात के लिये एक महत्वपूर्ण संकरी जलमार्ग है। भारत की कुल तेल आयात का एक‑तिहाई से अधिक इस जलमार्ग से गुजरता है, इसलिए इसका किसी भी रूप में व्यवधान भारतीय ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है। इस संदर्भ में दिल्ली की विदेश नीति को दो‑धारा वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है: एक ओर अमेरिकी‑ईरानी टकराव को सीमित रखने की कोशिश, तो दूसरी ओर अपने समुद्री सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करने की तत्काल ज़रूरत।
वर्तमान में अमेरिकी सचिव विदेश मामलों ने बयान दिया है कि हॉर्मुज़ को अडिग रखेगा, जबकि ईरान के राष्ट्रपति ने कहा है कि समुद्री रास्ते पर ‘विरोध न होने तक’ कोई समझौता नहीं होगा। दोनों पक्षों की इस अडिगता को देखते हुए नीति निर्धारकों की गलती का मार्जिन निकटतम स्तर पर आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई पक्ष ‘भारी‑हाथी’ कार्रवाई करता है—जैसे जहाज़ों की बाधा या मिसाइल प्री-एंप्टिव शॉट—तो यह सन्देश ‘एस्केलेशन अनिवार्य’ को मजबूर कर सकता है।
ऐसी स्थिति में भारत के लिए दो प्रमुख जोखिम उत्पन्न होते हैं। पहला, तेल की आपूर्ति में व्यवधान के कारण मूल्य वृद्धि और आर्थिक अस्थिरता; दूसरा, भारतीय नौसैनिक बल को संभावित संघर्ष में तत्काल प्रवेश के लिये तत्पर होना। रक्षा मंत्रालय ने पहले ही कहा है कि भारतीय नौवहन ताकतों को ‘उच्च सतर्कता’ पर रखा गया है और ‘सुरक्षा गुप्तचर’ को सुदृढ़ किया गया है। परन्तु विपक्षी दलों ने इस घोषणा को अधूरा करारा, यह सवाल उठाते हुए कि सरकार ने क्यों न पहले से एक वैकल्पिक तेल स्रोत या रणनीतिक भंडारण योजना तैयार की हो।
सरकार ने जवाब देते हुए कहा कि भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर टिके हुए हैं और भारत‑अमेरिका‑जापान‑ऑस्ट्रेलिया (QUAD) जैसी मंचों पर सहयोग को बढ़ाया जा रहा है। तभी यह बयान सूखा व्यंग्य की तरह सुनाई देता है, क्योंकि QUAD की नीति अभी तक हॉर्मुज़ जलमार्ग को सुरक्षित रखने के लिये कोई ठोस कार्रवाई नहीं बताती। साथ ही, ईरानी रुख को ‘अस्थिरता का स्रोत’ मानते हुए, भारत का ‘संतुलन नीति’ भी वही ही रह गई है जो सालों से कूटनीति के ‘खिचौटे’ को दर्शाती है।
सारांश में, हॉर्मुज़ जलमार्ग पर अमेरिका‑ईरान टकराव का प्रत्येक कदम न केवल मध्य‑पूर्व की भू‑राजनीति को उलट‑फेर कर सकता है, बल्कि भारत की ऊर्जा‑सुरक्षा एवं विदेश‑नीति के मूल सिद्धांतों को भी कठिन बना देगा। इस मोड़ पर ज़रूरी है कि भारत न केवल समुद्री सुरक्षा में निवेश करे, बल्कि तेल‑आयात की विविधता, रणनीतिक भंडारण और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के विकास पर त्वरित नीति‑निर्णय भी करे—नीतियों का आलंस सिर्फ शब्दों की चमक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित की वास्तविक सुरक्षा होनी चाहिए।
Published: May 6, 2026