जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: राजनीति

सिरिया के सूयदा में कैप्टैगन व्यापार का उछाल, भारत की सुरक्षा‑परविदेश नीति पर सवाल

मध्य‑पूर्व में स्थित सिरिया का सूयदा प्रांत अब एक बहु‑अर्ब डॉलर की कैप्टैगन (एम्फ़ेटामाइन‑आधारित उत्तेजक दवा) की तस्करी का नया केंद्र बन चुका है। इस व्यापार की तीव्र वृद्धि ने पड़ोसी जोर्डन को हवाई हमले करने के लिए मजबूर किया, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा संकट जड़ जाए। जबकि इस ज्वाला को मध्य‑पूर्वीय जटिलताओं के रूप में समझा जा रहा है, दिल्ली में इसे भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के आयाम में दोहरा प्रश्न उठाता है।

कैप्टैगन, जो पहले लेबनान और लिबिया के बदले में सरहद पार तस्करी के रूप में घटित था, अब सूयदा के पहाड़ी मार्गों से यूरोप, उत्तर‑आफ़्रीका और यहाँ तक कि एशिया के प्रमुख बाजारों में प्रवाहित हो रहा है। औपचारिक तौर पर, जोर्डन ने पिछले दो हफ्तों में कम से कम दो हवाई हमले किए हैं, जिनका लक्ष्य “तस्करी के मुख्य ठिकानों” को नष्ट करना था। हालांकि, इन अभियानों की प्रभावशीलता अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है, और कई बार यह आरोप लगे हैं कि विमानशीलता के आँकड़े अधिकतम रूप से प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

भारत की विदेश मंत्रालय ने इस विकास को “विलम्बित” और “समीक्षात्मक” कहा, साथ ही कहा कि “हम क्षत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के साथ समन्वय जारी रखेंगे”। हालांकि, इस बयान में वास्तविक नीति उपायों की कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं मिलती, जिससे विपक्षी दलों के प्रश्न उठ रहे हैं। विपक्ष ने कहा कि भारत के पास न केवल मध्य‑पूर्व में जमीनी संरचना नहीं है, बल्कि आर्थिक तस्करी के लिए संकल्पना भी नहीं है, जबकि सरकार अक्सर “सरकारी सहयोगियों के साथ सक्रिय संवाद” का सहारा लेती है।

यह असंतोष विशेषकर चुनाव‑समय के माहौल में और तीव्र हो गया है। कुछ प्रमुख पार्टी नेताओं ने इस अवसर का उपयोग करके सरकार की “विदेश नीति में लापरवाह रवैया” और “सुरक्षा प्रतिक्रियाओं में ढील” को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि “सिर्फ शब्दों से सीमा‑सुरक्षा नहीं बचाई जा सकती, जब हमारे पड़ोसी देशों में तुलनात्मक रूप से सशस्त्र कार्रवाई हो रही है।” दूसरी ओर, सरकार के समर्थक यह तर्क देते हैं कि भारत के पास “अभी तक इस तरह की सीमा‑पार तस्करी के सीधे प्रभाव नहीं दिखे” और इसलिए प्राथमिकता अन्य क्षेत्रों में है।

निरोध की दृष्टि से, कई विशेषज्ञों ने संकेत दिया है कि यदि सूयदा का कैप्टैगन नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय नकद प्रवाह को बढ़ाता है, तो वह भारतीय एजेंटों को भी लक्ष्य बना सकता है, विशेषकर उत्तर‑प्रवेश द्वारों पर (जैसे हेटो या बाराणसी) जो पहले ही नशीली दवाओं के तस्करी के इतिहास से ग्रस्त हैं। इस पर मौजूदा नीति – “केन्द्रीय नियोजन के तहत कड़े निरीक्षण” – को फिर से परीक्षण की जरूरत है। कई कांग्रेस राजनेता और सिविल सोसाइटी समूह मांग कर रहे हैं कि एक विशेष वैधानिक समिति बनाकर नशीली दवाओं के बहुराष्ट्रीय नेटवर्क की जांच की जाए, और साथ ही “इंटेलिजेंस साझेदारी” को सुदृढ़ करने के लिए एक पारदर्शी ढांचा तैयार किया जाए।

साथ ही, यह घटना भारत की “आतंकवाद निरोध” नीति के साथ भी टकराव दर्शाती है। यदि मध्य‑पूर्व में बढ़ी हुई ड्रग-ट्रैफ़िक जर्जर समूहों को आर्थिक समर्थन देती है, तो वह मौजूदा आतंकवादी नेटवर्क को पुनः सशक्त बनाकर भारत के सुरक्षा परों पर असर डाल सकता है। इस दायरे में, रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक बयानों में “उन्नत सिग्नल इंटेलिजेंस” का उल्लेख है, परंतु ठोस उपाय – जैसे सीमा‑पार आर्थिक निगरानी, एंटी‑मनी लॉन्ड्रिंग फ्रेमवर्क की मजबूती – अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं।

संक्षेप में, सूयदा में कैप्टैगन व्यापार का उदय न केवल एक भौगोलिक मुद्दा है, बल्कि भारत के भीतर सुरक्षा, नीति, और राजनीतिक जवाबदेही के प्रश्नों को भी ताज़ा करता है। जब सरकार शब्दों में “समन्वय” का दावा कर रही है, तो विपक्ष और विशेषज्ञ समान रूप से पूछ रहे हैं – क्या इस “समन्वय” में कार्रवाई के ठोस कदम हैं, और क्या इस कदमों के पीछे उन जनता की आवाज़ का प्रतिबिंब है, जो निरपराध नागरिकों के स्वास्थ्य व सुरक्षा को लेकर चिंतित है?

Published: May 6, 2026