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Category: राजनीति

सामाजिक न्याय बना पश्चिम का नया धर्म: भारत में राजनीतिक प्रभाव की पड़ताल

पश्चिमी देशों में धर्म के क्षीण होते प्रभाव के बदले सामाजिक न्याय को नया आध्यात्मिक ढाँचा मानने की प्रवृत्ति अब मात्र वैचारिक बहस से आगे बढ़कर राजनीति के व्यावहारिक मुद्दे बन गयी है। इस बदलाव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई विचारकों ने ‘नयी धर्म’ की श्रेणी में रखकर विश्लेषित किया है। भारत में भी इस प्रवृत्ति के प्रतिध्वनि सुनाई दे रही है, जहाँ राजनीतिक दलों ने सामाजिक‑न्याय के नैतिक दावे को घरेलू नीति, चुनावी रणनीति और सार्वजनिक बहस का हथियार बना दिया है।

वर्तमान में केंद्र सरकार सामाजिक‑न्याय को ‘वैश्विक मानदंड’ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि इसे अक्सर ‘पश्चिमी आयात’ कह कर विरोधी दलों की आलोचना का साधन बनाता है। केंद्रीय मंत्री ने रवी फरमा के ‘विश्व सामाजिक न्याय संधि’ पर भारत के समर्थन का जिक्र करते हुए कहा, “हमारी नीति किसी बाहरी विचारधारा से प्रेरित नहीं, बल्कि हमारे संविधान के मूल्यों का नैतिक विस्तार है।” यह बयान कई बार विरोधियों द्वारा ‘व्याख्या का साधन’ करार दिया गया है, जिनका तर्क है कि सामाजिक‑न्याय की शब्दावली को अक्सर आरक्षण‑संस्था, जेंडर‑क्वोटा और अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दों में ढालकर राजनैतिक अंक अर्जित किया जाता है।

विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस और राष्ट्रीय कांग्रेस (आरएसएस) ने इस प्रवृत्ति का दोहरा प्रयोग किया है। एक ओर, उन्होंने सरकार पर ‘पश्चिमी एजेंडा को ढालकर भारत के सामाजिक ताने‑बाने को कमजोर करने’ का आरोप लगाया, तो दूसरी ओर, वे स्वयं सामाजिक‑न्याय के ठोस मुद्दों—जैसे अनुसूचित जाति‑विवाह अधिकार, महिला सशक्तिकरण योजनाओं में पारदर्शिता, और शरणार्थी नीतियों में मानवाधिकार—को चुनावी वादों में शामिल कर रहे हैं। इस द्वन्द्व ने भारतीय मतदरों के बीच एक नई उलझन पैदा कर दी है: क्या सामाजिक‑न्याय का प्रयोग सरकार के दमनकारी कदमों को छुपाने के लिये किया जा रहा है, या यह वास्तव में सामाजिक समावेशन के लिये आवश्यक बहस है?

नीति‑प्रभाव की बात करें तो, हाल ही में लागू की गई ‘समान वेतन, समान कार्य’ योजना ने कई सार्वजनिक क्षेत्रों में वेतन ढाँचे को पुनः व्यवस्थित किया, परंतु असल में आर्थिक असमानता को घटाने के बजाय नौकरियों की सुरक्षा को कम कर दिया है। समान्य श्रमिक वर्ग ने इस कदम को ‘पश्चिमी सामाजिक‑न्याय के नाम पर तकनीकी सुधार’ बताकर विरोध किया। इसी प्रकार, निजी क्षेत्र में जेंडर‑क्वोटा के पालन को लेकर कई उद्योगपति मंडलों ने कहा कि इस उपाय से ‘उत्पादन क्षमता पर प्रभाव’ पड़ेगा, जबकि सरकारी आंकड़े इसे ‘समान अवसर’ का प्रमाण दर्शा रहे हैं। ये विरोधाभास दिखाते हैं कि सामाजिक‑न्याय के धार्मिक स्वर को सच्चे सुधार में बदलने के लिये प्रशासनिक जवाबदेही और स्पष्ट मापदंडों की कमी है।

जनमत सर्वेक्षण यह संकेत देता है कि लगभग 48 % उत्तरदाता सामाजिक‑न्याय को ‘आध्यात्मिक जरूरत’ मानते हैं, जबकि 37 % इसे ‘विदेशी विचारधारा’ के रूप में खारिज करते हैं। इस विभाजन ने चुनावी माहौल को और जटिल बना दिया है, जहाँ राजनीतिक दलों को न केवल वोट बैंक की जिएँ‑जाएँ नहीं, बल्कि सामाजिक‑न्याय की दार्शनिक अस्पष्टता का भी सामना करना पड़ता है।

संक्षेप में, पश्चिम में सामाजिक न्याय को नई धर्म की तरह स्थापित करने की प्रवृत्ति भारत में पहले से ही राजनीति, नीति‑निर्माण और सार्वजनिक विमर्श को पुनः आकार दे रही है। हालांकि, इस प्रवृत्ति को वास्तविक सामाजिक सुधार से जोड़ना अभी भी काफी हद तक प्रश्नवाचक बना हुआ है। उत्तरदायित्वपूर्ण शासन की मांग यह है कि ‘सामाजिक न्याय’ को केवल रैखिक वाक्यांश नहीं, बल्कि ठोस, मापनीय और भारतीय संदर्भ के अनुरूप नीतियों में बदल कर ही जनता के हित में लाया जा सके।

Published: May 5, 2026