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Category: राजनीति

सुप्रीम कोर्ट ने हटाए उच्च आयात-निर्यात शुल्क, मार्च में भारत का व्यापार घाटा बढ़ा

भारत का व्यापार घाटा मार्च माह में बढ़ा, जबकि निर्यात‑आयात दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई। इस परिवर्तन का प्रमुख कारण सुप्रीम कोर्ट का हालिया न्यायालयीय निर्णय है, जिसमें उसने फरवरी में केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए कई उच्च स्तर के आयात एवं निर्यात शुल्क को निरस्त कर दिया।

पिछले दो वर्षों में मौजूदा सत्ता दल ने घरेलू उद्योगों को बचाने और मौद्रिक घाटे को नियंत्रित करने के नाम पर सर्वाधिक दरें लगाई थीं। विपक्ष ने इन उपायों को ‘व्यापारिक संरक्षणवाद’ और ‘उत्पादक वर्ग के खुले बाजार को नुकसान’ का आरोप लगाते हुए लगातार चुनौती दी थी। अदालत के आदेश ने इस नीति को उलट दिया, जिससे वस्तु प्रवाह में रुकावटें हटीं और दोनों ही पक्षों—निर्यातियों और आयातियों—को राहत मिली।

निर्यात में 4.3 % की बढ़ोतरी और आयात में 3.9 % की उछाल से स्पष्ट होता है कि भारतीय उद्यमों ने विदेशी बाजारों में फिर से प्रतिस्पर्धा का अवसर पाया। परंतु, यह उछाल व्यापार घाटे को घटाने के बजाय उसे 2.1 % तक बढ़ा देता है, क्योंकि आयात का कुल मूल्य निर्यात से अधिक रहा। इस परिणाम ने सरकार के प्रशासनिक जवाबदेही को चुनौती दी है, क्योंकि शुरुआती नीति का उद्देश्य ही घाटे को संकरी करना था, न कि उसे अधिक खोलना।

विधान शाखा में इस पर बहस तेज हो गई है। विपक्षी दल मंगलवार को संसद में सरकार के आर्थिक मामलों के मंत्रिश्री के खिलाफ ‘अनुचित आर्थिक प्रबंधन’ का मुद्दा उठाते हुए प्रश्न उठाया कि क्यों ऐसी नीतियां बनायीं गईं जो उच्चतम करों के माध्यम से प्रतिकूल प्रभाव डालती थीं, जबकि न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि ये कर संविधान के उलट थे। उन्होंने कहा, “सरकार ने आर्थिक सुरक्षा के नाम पर राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुंचा दिया, और अब वह न्यायालय के निर्णय से बच नहीं सकती।”

केंद्र सरकार ने इस पर कहा कि कोर्ट के आदेश के बाद वो “वित्तीय अनुशासन” को पुनर्स्थापित करने के लिए “नवीन ऑन-रिले” उपायों पर काम कर रही है। स्थायी समाधान के रूप में वित्त विभाग ने नई आयटम‑बेस्ड कर नीति का मसौदा पेश करने की बात कही, जिससे आयात‑निर्यात के बीच औसत टैक्स भार को संतुलित किया जा सके। परन्तु कई विश्लेषकों ने इस प्रस्ताव को “पुलिसी गाड़ी के पहिये बदलने जैसा” कहा, क्योंकि मौलिक रूप से राष्ट्रीय व्यापार रणनीति में दिशा-भ्रम ही समस्या का मूल है।

आगामी आम चुनावों का माहौल भी इस मुद्दे को और गहरा कर रहा है। शहरी मध्यम वर्ग, जो आयातित वस्तुओं पर निर्भर है, अब सरकार से स्पष्ट जवाबी कार्रवाई की अपेक्षा करता है, जबकि भारतीय निर्यातियों का वर्ग यह आशा रखता है कि नई नीति में निर्यातोन्मुख प्रोत्साहन शामिल होगा। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट की इस हस्तक्षेप ने न केवल व्यापार आँकड़ों को बदल दिया, बल्कि राजनीतिक संघर्ष को भी नई दिशा दी है—जहाँ नीति‑निर्माण, न्यायिक निरीक्षण और चुनावी दांव मिलकर भविष्य के व्यापार परिदृश्य का निर्धारण करेंगे।

Published: May 5, 2026