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Category: राजनीति

सुप्रीम कोर्ट ने एबॉर्शन पिल की डाक द्वारा उपलब्धता पर अस्थायी रोक हटाई

संयुक्त राज्य सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मिफ़ेप्रिस्टोन, जिसे चिकित्सा अभिसरण (एबॉर्शन) के लिए उपयोग किया जाता है, को डाक द्वारा उपलब्ध कराने की अस्थायी रोक हटाई। यह निर्णय तब आया जब एक अधीनस्थ न्यायालय ने फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के उस नियम को पुनर्स्थापित किया था, जिसके तहत गर्भनिरोधक पिल प्राप्त करने के लिये रोगी को व्यक्तिगत रूप से चिकित्सक से मुलाकात करनी पड़ती थी।

भारत के संदर्भ में यह मुद्दा कड़ी राजनीति का हिस्सा बन चुका है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को लेकर सरकार ने कई बार औपचारिक तौर पर समर्थन जताया है, पर व्यावहारिक पहल में अक्सर विधायी अड़चनें और सामाजिक दबाव सामने आते हैं। इस अमेरिकी फैसले को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शासक वर्ग ने अक्सर सरकार की ‘सुरक्षा‑प्राथमिकता’ की नीति के साथ तुलना करने का प्रयास किया है, जबकि विपक्षी संगठनों ने इसे ‘महिलाओं के अधिकारों के उलटे सिकोड़े का संकेत’ कहा।

सुप्रीम कोर्ट का यह अस्थायी आदेश, जो वकालत समूहों द्वारा दायर याचिका के खिलाफ दिया गया, दर्शाता है कि न्यायिक प्रणाली अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अनावश्यक प्रतिबंधों को चुनौती देने को तैयार है। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि इस निर्णय के पीछे नीति निर्माताओं की अनिच्छा ही प्रमुख कारण है— FDA द्वारा लागू किया गया व्यक्तिगत परामर्श नियम, जिसने कई ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिये अभिगम्यता को हद से अधिक सीमित कर दिया। भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय को इसी तरह की ‘रोगी‑परामर्श’ आवश्यकताओं को लागू करने में संकोच दिखाना अब प्रश्नात्मक रह गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नीचे के न्यायालय की इस फैसले से अभ्यर्थी डॉक्टरों और फार्मासियों को अपने कार्यप्रणाली में बदलाव करने के लिये बाध्य किया गया, जिससे कई प्रांतों में सेवा में देरी हुई। यह वही समस्या है जो भारत में अक्सर ‘ब्यूरोक्रैटिक काँच’ की तरह उभरी— नीति बनाते समय इच्छित लक्ष्य और वास्तविक कार्यान्वयन में बड़ी खाई। विपक्षी अभियुक्तों ने कहा कि इस तरह की अस्थायी रुकावटें महिलाओं के स्वास्थ्य को जोखिम में डालती हैं और सरकार को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित में तेज़‑तर्रार समाधान पेश करना चाहिए।

सार्वजनिक हित के लिहाज़ से इस निर्णय को एक चेतावनी के रूप में लेना जरूरी है। यदि भारत में भी समान प्रतिबंध हटाने के लिये न्यायिक जाँच की आवश्यकता पड़े, तो यह इंगित करेगा कि वर्तमान प्रशासनिक ढांचा महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को पर्याप्त रूप से संरक्षित नहीं कर पा रहा है। अब सवाल यह है कि शासक वर्ग इस अमेरिकी उदाहरण से सीख लेकर अपने स्वास्थ्य नीति में लचीलापन लाएगा या फिर हीन‑विरोधी समूहों की आवाज़ को दबाने के लिये कड़ाई से ‘वैद्यकीय निरीक्षण’ को दोबारा लागू करेगा।

Published: May 4, 2026