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Category: राजनीति

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स्थानीय चुनावों में महंगाई‑जलवायु जड़ता: हरित विशेषज्ञों ने दिया चेतावनीपूर्ण संकेत

विभिन्न राज्यों में इस महीने आयोजित होने वाले नगरपालिका‑राज्य चुनावों का प्रमुख मुद्दा अब सिर्फ रोज़मर्रा की कीमतों की उछाल नहीं, बल्कि उसकी जड़ें जो जलवायु परिवर्तन में गहरी निहित हैं, वह भी उभर कर सामने आ रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार, चुनावी मैदान पर ‘जीवनयापन खर्चा बढ़ रहा है’ की ही गूँज सुनाई देती है, परंतु जलवायु विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इस महंगाई की उत्पत्ति केवल माँग‑आपूर्ति असंतुलन नहीं, बल्कि जीवाश्म‑ईंधन पर देश की निरंतर निर्भरता भी है।

ग्रीनपीस इंडिया के नीति प्रमुख अमी मैकार्थी ने कहा, “जब लोगों के बिल में लगातार बढ़ोतरी का कारण बंधित जीवाश्म‑ईंधन के संकट को ही नहीं, बल्कि वही संकट को दूर करने के विकल्पों को रोका जाना भी है, तो चुनावी वादे सिर्फ शब्दों तक सीमित रह जाते हैं।” उनके अनुसार, मौजूदा सरकार के द्वारा कुछ राज्यों में सौर व पवन ऊर्जा परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाना, और कोयले के कई नए खनन प्लान को मंजूरी देना, एक ऐसे दुर्जेय विरोधाभास को जन्म देता है जहाँ ऊर्जा सुरक्षा का दावा, जलवायु सुरक्षा के नारे के साथ असंगत हो जाता है।

विरोधी दल, विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और आम आदमी पार्टी, इस मुद्दे को अपनी अभियान‑रणनीति में “ऊर्जा‑अनिराधार” के रूप में उजागर कर रहे हैं। कांग्रेस के प्रमुख विज्ञापन में कहा गया है, “कोयला‑आधारित बिजली के बिल में बढ़ोतरी को ‘पर्यावरणीय सौंदर्य’ कहा जाता है, पर असली सौंदर्य तो सस्ते, स्वच्छ ऊर्जा में है।” वहीं, दिल्ली में AAP के मुख्यमंत्री ने स्थानीय स्तर पर सौर पैनल के सब्सिडी योजना को तेज करने का वादा किया, परन्तु सत्ता के केंद्र में जारी नीतियों ने इस प्रयास को कई बार बाधित किया।

वित्त मंत्रालय ने हाल ही में घोषित ‘ऊर्जा‑सुरक्षा’ पैकेज में कोयला उत्पादन को 2028 तक 150 % तक बढ़ाने की योजना बनाई है, जबकि नवीनीकरण ऊर्जा के लक्ष्य को 450 GW तक पहुँचाने का मनोनयन किया गया है। यह दोहरी नीति, अनेक पर्यवेक्षकों के लिए विरोधाभासी प्रतीत होती है; पहले, कोयला पर भरोसा महँगी ईंधन कीमतों को स्थिर कर सकता है, परन्तु वही महँगा कोयला अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता, आयात‑उच्चता, और जलवायु‑सम्बन्धी लागतों को बढ़ाता है।

विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर सरकार जलवायु‑सुरक्षित ऊर्जा में निवेश को प्राथमिकता देती, तो सौर‑पवन फॉर्मूलेशन से न केवल बिजली के बिल में कमी आएगी, बल्कि विदेशी इंधन आयात पर निर्भरता भी घटेगी। एक रिपोर्ट में कहा गया कि सौर‑विंड‑हाइब्रिड ग्रिड अपनाने से अगले पाँच वर्षों में औसत घरेलू बिजली बिल में 30 % तक कटौती संभव है। फिर भी, नीति‑निर्माताओं द्वारा “पर्यावरणीय लक्ष्य” को “रोज़गार निर्माण” के बहाने धुंधला किया जा रहा है, जिससे जनता के विश्वास में दरार देखी जा रही है।

ब्याज‑दर में निरंतर वृद्धि, खाद्य एवं जीवन‑सामान की महंगाई के साथ, उपभोक्ता अपनी प्राथमिकताओं को पुनःनिर्धारित कर रहे हैं। चुनावी सर्वेक्षणों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिख रही है कि मतदाता अब “सस्ता और साफ़ ऊर्जा” को आर्थिक सुरक्षा के समान मानते हैं। यदि भविष्य के चुनावी परिणाम इस भावना को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करते, तो सरकार को न केवल आर्थिक, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं की भी आलोचना का सामना करना पड़ेगा।

Published: May 6, 2026