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स्थानीय चुनावों में फोटो‑आईडी अनिवार्य: भारत में चुनावी पहचान नीति पर सवाल
इंग्लैंड ने 7 मई को निर्धारित स्थानीय चुनावों में प्रत्यक्ष मतदान करने वाले सभी मताधिकारियों से वैध फोटो‑पहचान पत्र दिखाने की माँग की है। यह कदम, जो कई वर्षों में पहली बार लागू हो रहा है, ने न केवल ब्रिटेन के भीतर ही नहीं, बल्कि भारत में भी समान नीति पर पुनः बहस छेड़ दी है।
भारत में अब तक मतदान के लिए आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पैन कार्ड जैसे दस्तावेजों को वैध पहचान माना जाता रहा है, पर कोई भी राष्ट्रीय स्तर पर फोटो‑आईडी बंधन नहीं लगाया गया। हालांकि, कई राज्यों में चुनाव आयोग ने मतदान केंद्रों पर पहचान‑जाँच को सख्त कर दिया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को बढ़ावा देने के साथ-साथ संभावित धोखाधड़ी को रोकने की कोशिशें भी सामने आई हैं।
केन्द्रीय सरकार ने अभी तक इस दिशा में कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं रखा है, पर फिर भी उद्योग‑संघ और कुछ राजनीतिक पक्षों ने इंग्लैंड के नवीनतम कदम को ‘उदाहरण के तौर पर’ पेश किया है। गृह मंत्री ने कहा, “भले ही हम विदेश में देखे गये कदम को तुरंत अपनाएँ, यह हमारे लोकतांत्रिक ढाँचे की जरूरतों के हिसाब से आज़माना होगा।” वहीं विपक्षी दलों ने इसे ‘मतदाता बहिष्करण का नया हथियार’ कहा, यह तर्क देते हुए कि पहचान‑पत्र नहीं रखने वाले गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के मताधिकारियों को मतदान से बाहर किया जा सकता है।
छात्र समाज और नागरिक अधिकार संगठनों ने भी समान विरोध दिखाया। राष्ट्रीय लोकशक्ति मंच (एनएलपी) के प्रमुख ने उल्लेख किया, “फ़ोटो‑आईडी की अनिवार्यता का लक्ष्य भले ही चुनावी सुरक्षा को बढ़ाना हो, पर इसका सामाजिक पक्ष व्यापक रूप से अनदेखा किया गया है। बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी आधार कार्ड का डुप्लिकेट नहीं मिलता, सिवाय इसके कि लोग काग़ज़ी परेशानी में फँस जाएँ।” उन्होंने यह भी कहा कि संभावित तकनीकी त्रुटियों और असमान पहुँच को ध्यान में रखे बिना कठोर उपाय लागू करना ‘प्रशासनिक अंधाधुंधता’ बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फोटो‑आईडी को अनिवार्य करने से पहले दो पहलुओं की गहन जाँच आवश्यक है: पहला, पहचान‑पत्रों की उपलब्धता और उनकी वितरण प्रणाली; दूसरा, यह सुनिश्चित करना कि मतदान प्रक्रिया में कोई तकनीकी या लॉजिस्टिक बाधा न आए। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2025 में भारत में केवल 12.7 प्रतिशत मतदाता पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस रखते हैं, जबकि लगभग 84 प्रतिशत के पास आधार कार्ड है, पर बाध्यकारी फोटो‑आईडी के लिए आधार को आगे बढ़ाने में काफी समय और संसाधन लगेंगे।
नीति‑विश्लेषकों ने कहा कि यदि भारत में समान नियम लागू किया जाता है, तो उसे ‘कुशल पहचान प्रबंधन प्रणाली’ के साथ जोड़ना होगा, जिससे नागरिकों को अतिरिक्त दस्तावेज़ी बिल्ला न उठाना पड़े। कुछ राज्यों ने पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर बायो‑मैत्रिक सत्यापन का प्रयोग किया है, पर इस तकनीक को राष्ट्रव्यापी स्तर पर ले जाने में लागत और गोपनीयता संबंधी चिंताएँ बनी हुई हैं।
इस बीच, चुनाव आयोग ने कहा कि वे ‘सुरक्षा और समावेशिता’ के बीच संतुलन बनाते हुए किसी भी नई पहचान‑आवश्यकता को लागू करने से पहले व्यापक सार्वजनिक परामर्श करेंगे। यह कदम, यदि आगे बढ़ता है, तो भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की परीक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही की भी कसौटी बन सकता है।
Published: May 7, 2026