सूडान ने इथियोपिया के राजदूत को वापस बुलाया: खारतूम हवाई अड्डे पर हमले की साजिश का आरोप
सूडान ने आधिकारिक तौर पर इथियोपिया के राजदूत को लाखस्माना (Addis Ababa) से वापस बुला लिया, यह दावा करते हुए कि एथियोपिया ने खारतूम हवाई अड्डे पर हुए विस्फोटक हमले में परिधीय भूमिका निभाई है। इस कदम ने दोनों देशों के बीच पहले से ही तुटते कूटनीतिक संबंधों को और तेज कर दिया है।
ऐतिहासिक तौर पर, सुडान‑इथियोपिया सीमा विवाद, नाइल जलसंधियों और सीमा‑पर‑आधारित आपराधिक गतिविधियों से ग्रस्त रहा है। पिछले दो दशकों में, दुर्व्यवस्थापूर्ण शासन और जारी गृहयुद्ध ने सुडान को राजनीतिक अस्थिरता की कगार पर धकेला है, जबकि इथियोपिया ने अपनी आर्थिक उन्नति के नाम पर पड़ोसी पर दबाव बनाये रखने की कोशिश की है। इस नई आरोप‑प्रणाली को अक्सर रियासत‑प्रधान राजनीति और सैन्य गिरोहों के बीच के जाल के रूप में देखा जाता है, जहाँ किसी भी असफल ऑपरेशन को शत्रु पर थोप दिया जाता है।
सूडान के राष्ट्रपति के कार्यालय ने कहा कि “खारतूम में हुए हवाई अड्डे के हमले के पीछे एक विदेशी हाथ है, और वह हाथ इथियोपिया से निकला है।” यह बयान घरेलू विपक्ष को भी कागज पर डालने का अवसर बन गया, जहाँ कई प्रमुख नेता इस घटना को सरकार की सुरक्षा‑नीति की प्रणालीगत विफलता के रूप में देख रहे हैं। वे दावा करते हैं कि राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था ‘अस्पष्ट’ तथा ‘संसाधनों का अतिप्रयोग’ दिखाती है, जबकि असली खतरा पड़ोसी राष्ट्रों के साथ बढ़ते तनाव से अधिक है।
इथियोपिया की ओर से मिलते‑जुलते शब्दों में “हम इसमें संलग्न नहीं हैं” की कठोर अस्वीकृति मिली। एथियोपिया के विदेश मंत्रालय ने कहा, “हवाई अड्डे पर हुई ध्वंसक कार्रवाई का कोई भी प्रमाण हमारे पक्ष में नहीं है; यह केवल सुडानी सत्ता द्वारा अपनी विश्वसनीयता को बचाने के लिए निर्मित कथा है।” यह बयान आपको यह याद दिलाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर हर राजनैतिक दावे की परतें सच्चाई को ढँक देती हैं।
क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस झड़प का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। सुदान के अन्दरूनी संघर्ष, एथियोपिया के साथ जल और ऊर्जा समझौते, और अफ्रीकी संघ (AU) में दोनों देशों की प्रमुख स्थिति, इन सभी को मिलाकर एक व्यापक कूटनीतिक संकट की रूपरेखा बन रही है। भारत के लिए यह विकसित होते हुए एशिया‑अफ़्रीका संबंधों में एक जाँच‑पड़ताल का अवसर हो सकता है, क्योंकि भारत अभी भी अफ्रीका में अपनी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रहा है। इस संदर्भ में, भारत को अपनी नीति‑दिशा को ‘सरल पक्षधरता’ से हटाकर ‘संतुलित मध्यस्थता’ की ओर मोड़ना आवश्यक हो सकता है, नहीं तो यह पुनरावृत्त तनावों में फँस सकता है।
जैसे ही सुडान ने राजदूत को बुलाया, असली सवाल यह बन गया कि यह कदम क्या सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी जिम्मेदारी सिद्ध करने के लिए ‘बुर्ज़ुगी’ के रूप में इस्तेमाल किया गया है? क्या यह कूटनीतिक प्रतिक्रिया सिर्फ एक प्रतीकात्मक इशारा है, जबकि वास्तविक कार्रवाई—जैसे सीमाओं की सुरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा, और जल‑अनुबंधों की पुनः समीक्षा—छूट रही है? इस प्रकार, सार्वजनिक हित के पहलू से इस विवाद को देखना आवश्यक है, क्योंकि आम नागरिकों को इन उच्च‑स्तरीय राजनीतिक खेलों के परिणामस्वरूप रोज़मर्रा की समस्याएँ, जैसे बिजली कटौती, जल अभाव और आर्थिक अस्थिरता, का सामना करना पड़ता है।
अंत में, यह घटना दर्शाती है कि अफ्रीकी कूटनीति में अधिकार‑संतुलन की धारा कितनी पतली है, और कैसे सत्ता‑संरक्षण की चाह अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सिद्धांतों को धुंधला कर देती है। यह भी स्पष्ट है कि सुडान‑इथियोपिया के बीच की इस नई लकीर का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति‑संतुलन और भारत सहित कई देशों की अफ्रीका‑नीति पर गहरा प्रश्न चिह्न लगा देगा।
Published: May 6, 2026