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Category: राजनीति

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स्टारमर ने सिविल सेवा को सत्ता को सच बताने का आदेश दिया, रूबिन्स बर्खास्तगी के बाद

लंदन: आज प्रधानमंत्री केयर स्टारमर ने अपने नए‑नवीन प्रशासनिक अध्यादेश में सिविल सेवा को "सत्ता को सच बताने" की स्पष्ट हिदायत दी, जबकि विदेशी मंत्रालय के पूर्व प्रमुख सर ऑल्ली रॉबिन्स की बर्खास्तगी से उत्पन्न करुणा-पूरित माहौल जारी है। यह पत्र, जो सरकारी विभागों के सभी स्तरों में वितरित किया गया, उन हालिया विवादों को पाटने के इरादे से लिखा गया, जहाँ कई अधिकारियों ने कहा कि किसी आधी‑सत्ता के तहत नियुक्तियों की जांच (वेटिंग) ने स्वतंत्र कार्य प्रणाली को दबाव में डाल दिया।

रॉबिन्स को मई 2025 में, जब वे विदेश मंत्रालय के वाइस‑चैंबर में रह चुके थे, अचानक पद से हटाया गया। सरकारी स्रोतों ने कहा कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण था, परंतु कई विशेषज्ञ और सिविल सर्विस यूनियन ने इसे राजनीतिक हेरफेर का हिस्सा बताया। हटाने के तुरंत बाद, कई अधिकारियों ने ‘वेटिंग रिव्यू’ पर सवाल उठाए, यह दावा करते हुए कि नई सरकार अपने क्रमशः कार्यों में राजनैतिक दृष्टिकोण से सिविल ब्यूरोक्री को नियंत्रित करना चाहती है।

स्टारमर की इस हिदायत का समय संरचनात्मक असंतोष को दृढ़ करने के इरादे से हो सकता है। अपनी पत्र में वह “सच्ची उत्तरदायित्व” का उल्लेख करते हुए कहा, “जब भी कोई सरकारी निर्णय जनता या अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रश्न उठाता है, तो हमें अपनी आवाज़ उठानी चाहिए। प्रशासन की स्वीकृति के बिना कोई भी नीति प्रभावी नहीं है।” इस बयान के साथ-साथ उन्होंने कहा कि “सिविल सेवा के सदस्य, चाहे पद की ऊँचाई कोई भी हो, अपने कार्यस्थल पर स्वतंत्रता से विचार व्यक्त करने का अधिकार रखते हैं।”

परन्तु विपक्षी पार्टियों, विशेषकर कॉन्झर्वेटिव दल और लिबरल डेमोक्रेट्स ने इस कदम को ‘राष्ट्रपतित्व के वैधता से वंचित’ करार दिया। उन्होंने त्वरित प्रश्नावली सत्र में मांग की कि अति‑संकुचित ‘वेटिंग रिव्यू’ के पीछे कौन-सी वास्तविक कारण छुपे हैं और क्या यह ‘विचार विमर्श को रोकने वाले’ प्रचलनों के विरुद्ध एक बौद्धिक प्रतिकार नहीं है। लियोनार्ड जॉर्ज, कॉन्झर्वेटिव के मुख्य spokesmen, ने कहा, “एक प्रधानमंत्री जो सिविल सेवा को बंधित नहीं, बल्कि ‘सच्चाई को बताने’ के लिए बुलाता है, वह उन नीतियों को मानता है जो पारदर्शिता को रोकते हैं। यह केवल शब्दों का खेल है।”

सिविल सेवा संघ भी इस कदम को खुलेआँख पर शंका में देख रहा है। उन्होंने कहा कि “सरकारी संस्थानों में स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व का संतुलन तब स्थापित होता है, जब सर्वेक्षणात्मक प्रबंधन के साथ साथ वास्तविक कार्य के लिए स्थान बचा रहे हों।” उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि सरकार को खुद को ‘सच्चाई के प्रहरी’ कहने के बावजूद, कई मामलों में ‘आलोचना के लिए कट्टरता’ देखी गई है, जैसे कि विदेश नीति में ‘बिल्डिंग ब्लॉक’ होने वाले दस्तावेजों को ‘वर्गीकृत’ कर देना।

नीति‑प्रभाव के संदर्भ में यह संवाद भारत के सार्वजनिक प्रशासन के साथ एक निरूपणात्मक समानता प्रस्तुत करता है। जहाँ भारत में भी ब्यूरोक्री को ‘वेटिंग’ और ‘पॉलिसी फ़्रेमवर्क’ के माध्यम से अभ्यर्थी किया जा रहा है, वहाँ सत्य को ‘सत्ता’ तक पहुँचाने की प्रक्रिया में अक्सर बाहर की आवाज़ों को अंधा कर दिया जाता है। स्टारमर की इस संकेतात्मक पुकार को देखा जा रहा है कि क्या यह सत्र में चल रहे ‘डिजिटलीकरण’ और ‘खुली शासन’ के युग में वास्तविक बदलाव लाएगा, या केवल एक राजनैतिक प्रस्तुति बनेगा।

जैसे-जैसे इस मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा तेज़ हो रही है, यह स्पष्ट है कि सिविल सेवा के भीतर ‘सच का साहस’ केवल शब्द नहीं, बल्कि व्यावहारिक निहितार्थों से जुड़ा होगा। क्या स्टारमर के शब्द जारी अधिकारियों को सच्ची स्वतंत्रता प्रदान करेंगे, या यह निरन्तर निगरानी के तहत एक फिर से निर्मित ‘नए नियम’ का भाग बनेंगे – यह समय ही तय करेगा।

Published: May 7, 2026