स्टारमर ने कहा, एंटीसेमिटिज़्म के ‘संकट’ से निपटने के लिए समाज को मिलकर कदम उठाएँ
ब्रिटेन के लेबर नेता केर्नल स्टारमर ने पिछले मंगलवार को विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुखों को एकरूपता में बुलाते हुए एंटीसेमिटिज़्म को एक सामाजिक संकट घोषित किया। यह घोषणा कई हालिया हमलों के बाद आई, जिनमें ब्रिटिश यहूदियों के विरुद्ध किए गए सशस्त्र और घोटालात्मक कृत्य शामिल हैं। स्टारमर ने पुलिस, कला संस्थान और विश्वविद्यालय प्रमुखों को एकत्रित कर एक विशेष शिखर सम्मेलन आयोजित करने का इशारा किया, ताकि हिंसा के मूल कारणों को पहचान कर राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनायी जा सके।
इसी पृष्ठभूमि में भारतीय राजनीति में भी समान तनाव स्पष्ट हो रहा है। देश में हाल के महीनों में विविध धर्मीय संगठनों के बीच असहनीय भेदभाव और हिंसा की घटनाएँ चुपचाप नहीं रही। केंद्र सरकार ने कई बार संवाद की बात कही है, पर वास्तविक कदम अक्सर घोषणात्मक ही रह जाते हैं। इस बात को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक समाज ने लगातार सवाल उठाए हैं: क्या सरकार सिर्फ शब्दों की किलकारियों पर रुक गई है, या वास्तविक रूप में एंटी‑सेमिटिक और सामुदायिक हिंसा को जड़ से खत्म करने की ठोस योजना है?
स्टारमर के इस पहल को भारतीय पक्ष में दो तरह से देखा जा रहा है। एक ओर, गांधीवादी संकल्पना के समर्थक इसे एक सकारात्मक उदाहरण मानते हैं, जहाँ विविध क्षेत्रों के सहयोगी एकजुट हो कर सामाजिक बुराई का सामना कर रहे हैं। दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस बात को उजागर करते हैं कि भारतीय सरकार अक्सर “संवेदनशीलता” के दावे में लिप्त रहती है, पर “सुरक्षा” के लिये ठोस क़ानून बनाने में देर कर देती है। वे यह तर्क देते हैं कि सैकड़ों भेदभाव के मामलों में कानून का कोटि‑कोटि तक उपयोग नहीं हो पाया है, जबकि शब्दों की “डिप्लोमैटिक” नीतियों पर अधिक भरोसा किया गया है।
ब्रिटेन में पुलिस लीडरशिप को भी इस संकट में अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। स्टारमर ने कहा, “हम चाहते हैं कि पुलिस, कला अकादमी और शैक्षणिक संस्थान मिल कर न केवल घटनाओं को रोकें, बल्कि सामाजिक बायस को भी चुनौती दें।” भारतीय पुलिस संरचना के बारे में आलोचनात्मक आवाज़ें इस बात पर जोर देती हैं कि कई बार स्थानीय पुलिस दल हिंसा के बाद ग़ैर‑जिम्मेदारियों को टालते हैं, और जनसाधारण का विश्वास कमज़ोर होता जा रहा है।
एक और सवाल उठता है—नीति‑निर्माण में किस हद तक ‘संस्कृति’ को ध्यान में रखा जा रहा है? स्टारमर ने कला संस्थानों को बुलाने का संकेत दिया, यह मानते हुए कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति ही अक्सर गहरी सामाजिक धारणाओं को बदल सकती है। भारत में भी कई कलाकार और फिल्म निर्माताओं ने धार्मिक विभाजन को लेकर आलोचना को झेला है, और अक्सर “आर्ट” को “विरोधाभास” के रूप में लेबल किया जाता है। यह एक प्रकार का द्वैत है—जहां सरकार सुरक्षा का दावा करती है, वहीं कला को अक्सर “राजनीतिक जोखिम” माना जाता है।
सम्पूर्ण रूप से, स्टारमर की पहल से यह स्पष्ट होता है कि एक जटिल सामाजिक समस्या को केवल एक मंत्रालय या विभाग के दायरे में हल नहीं किया जा सकता। इसे बहु‑स्तरीय सहयोग, क़ानून में त्वरित संशोधन, और जनजागरूकता का समुचित मिश्रण चाहिए। भारतीय राजनीति को भी इसी तरह की बहु‑क्षेत्रीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है—क्योंकि “समाज को ही संकट से बाहर निकालना” का शाब्दिक अर्थ तभी सम्भव है, जब सभी हितधारक अपने‑अपने ‘वर्चस्व’ को त्याग कर साझा लक्ष्य की दिशा में काम करें।
Published: May 5, 2026