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Category: राजनीति

स्टार्मर ने एंटीसेमिटिज़्म को ‘हम सबका संकट’ कहा, नई निधि योजना पर विरोधी सवाल

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केयर स्टार्मर ने गुरुवार को डाउनिंग स्ट्रीट में आयोजित एक समग्र मंच में एंटीसेमिटिज़्म को "हम सबके लिए संकट" घोषित किया। उन्होंने कहा कि गॉल्डर्स ग्रीन में हुए आतंकवादी हमले को एक अनायास घटना नहीं, बल्कि "उभड़ती एंटीसेमिटिज़्म की प्रवृत्ति" का हिस्सा माना जाना चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार ने यह भी घोषणा की कि अगले वित्त वर्ष में यहूदी समुदायों को समर्थन देने हेतु कुल 1 करोड़ पाउंड (लगभग 1.1 अरब रुपये) की अतिरिक्त निधि उपलब्ध कराई जाएगी, जिसमें बार्नेट काउंसिल को 5 लाख पाउंड (55 करोड़ रुपये) तुरंत मिलेंगे।

स्टार्मर का बयान तत्कालीन राजनीतिक माहौल में आया है, जहाँ लैबॉर पार्टी को हाल ही में आम चुनाव में सत्ता में लौटना पड़ा है। सरकार ने यह बताया कि यह धनराशि "सुरक्षा, सामाजिक एकजुटता और आत्यन्तिक समर्थन" के उद्देश्य से दी जा रही है, जिससे झड़प वाले क्षेत्रों में सामुदायिक संबंध मजबूत हों। विपक्षी कॉनजरवेटिव दल ने इस पहल को दोहरे मानदंड के रूप में घात दिया, यह प्रश्न उठाते हुए कि क्यों यहूदी समुदाय को इस स्तर का समर्थन मिल रहा है जबकि देश के कई अन्य अल्पसंख्यक समूह अभी भी समान संरक्षण से वंचित हैं।

विपक्षी नेता रिचर्ड हारिंगटन ने कहा, "सरकार का एंटीसेमिटिज़्म पर कठोर रुख प्रशंसनीय है, परन्तु यह तभी प्रभावी रहेगा जब सभी धार्मिक‑जातीय अल्पसंख्यकों को समान रूप से अनुशंसित संसाधन मिलें। आज केवल यहूदी समुदाय को लक्षित करना लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांत का उल्लंघन है।" उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस निधि के वितरण में पारदर्शिता की कमी, भविष्य में भ्रष्टाचार तथा पक्षपात के जोखिम को बढ़ा सकती है।

इसी दौरान प्रमुख सिविल सोसाइटी समूहों ने मुद्दे को राष्ट्रीय मूल्य परीक्षा के रूप में प्रस्तुत किया। "एक लोकतंत्र तभी भरोसेमंद बनता है जब वह सभी समुदायों के प्रति समान सुरक्षा प्रदान करे," मानवाधिकार संगठन ‘इंक्लूसिव यूके’ के प्रवक्ता ने कहा। उन्होंने सरकार को आग्रह किया कि आवंटित निधि के प्रयोग की नियमित ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, जिससे जनता को भरोसा हो कि धनराशि वास्तविक सामुदायिक विकास में लग रही है।

भारत में भी समान चुनौतियों का सामना हो रहा है, जहाँ हाल के वर्षों में धार्मिक तनाव और सुरक्षा संबंधित मुद्दों पर सरकार का ढीला उपाय अक्सर आलोचना का केंद्र बना है। स्टार्मर की इस पहल को देखते हुए भारतीय नीति निर्माताओं के लिए एक सीख मिल सकती है: बहु-समुदायीय सुरक्षा को मात्र शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस वित्तीय समर्थन और पारदर्शी निगरानी के माध्यम से सिद्ध करना होगा।

भविष्य में इस निधि योजना की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए संसद में एक विशेष समिति का गठन करने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह समिति निष्पक्षता और समयबद्धता से काम करती है, तो सरकार का यह कदम न केवल एंटीसेमिटिज़्म के खिलाफ एक ठोस जवाब हो सकता है, बल्कि विविध सामाजिक ताने‑बाने को सुदृढ़ करने की दिशा में एक मील का पत्थर भी बन सकता है। अभी स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर राजनीति, नीति और सार्वजनिक हित आपस में जटिल रूप से जुड़े हुए हैं, और कोई भी समाधान तभी सफल होगा जब सबके हितों को बराबर ध्यान दिया जाए।

Published: May 5, 2026