विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर पोप के संदेश पर सरकार की बेबसी: भारतीय पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल
पोप लियो XIV ने 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तीव्र भावनाओं से भरपूर भाषण दिया, जिसमें उन्होंने उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित की जो युद्ध क्षेत्रों में सत्य के पीछे भागते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं। पोप ने सभी विश्वभक्तों से आग्रह किया कि वे इन शहीदों को याद रखें और प्रेस की स्वतंत्रता को सम्मानित करने का संकल्प लें। यह भावना भारत में भी गूंजती है, परंतु यहाँ की वास्तविकता अक्सर पोप के आदर्शों से बहुत ही दूर रहती है।
वहांत, भारत में पत्रकारों की सुरक्षा एक गहरी असुविधा बन चुकी है। रेक्टर रैंकिंग में भारत निरन्तर नीचे गिरता जा रहा है, और पिछले साल में ही तीन प्रमुख पत्रकारों की मौत, दो को गंभीर धमकी और कई को पुलिस द्वारा गलत तरह से हिरासत में लेने जैसी घटनाएँ सामने आई हैं। केंद्रीय सरकार ने इन घटनाओं को ‘अफ़सोसजनक’ कहा और ‘अधिकारियों को कड़ी जांच करने का वादा’ किया, पर इस वादे की नक़ल और वास्तविक कार्रवाई के बीच अक्सर बहुत बड़ा अंतर रहता है।
सत्ता में रहने वाले राष्ट्रीय कार्यदल ने कई बार प्रेस स्वतंत्रता को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर प्रतिबंधित करने की कोशिश की, जबकि विपक्षी दल ने इन कदमों को ‘लोकतंत्र की हत्या’ कहा। हाल ही में लोकसभा में चर्चा हुई कि किस तरह डिजिटल मंचों पर पत्रकारों के लेखों को ‘कट्टरता’ के झंडे तले ब्लॉक किया जा रहा है। विपक्षी नेता कर्नाटक के राजनेता ने संसद में कहा, “पोप का संदेश सुनने के बाद हमें यह याद रखना चाहिए कि स्वतंत्र प्रेस के बिना लोकतंत्र का अस्तित्व नहीं है, फिर भी सरकार के निर्णय दरबारी कवायदों से भरपूर हैं।”
सरकार की ओर से प्रस्तुत “सुरक्षा उपाय योजना 2025” केवल कागज़ी वादे तक सीमित प्रतीत होती है। इस योजना में ‘अत्यावश्यक स्थिति में पत्रकारों की सुरक्षा’ का हवाला दिया गया है, पर वास्तविक आयाम—जैसे जोखिम वाले क्षेत्रों में संविदा‑आधारित गार्ड का प्रावधान, अथवा स्वतंत्र जांच एजेंसियों की स्थापना—अब तक लागू नहीं हुई। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अभियोक्ताओं को रिपोर्ट करना अनिवार्य करने का आदेश दिया, पर कार्यान्वयन में देरी बनी हुई है।
जब पोप ने “सत्य की खोज में कुर्बानी देना एक शहीदी है” कहा, तो भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में अक्सर वही शहीदी का आभास मिलता है जहां पत्रकार अपने विचार व्यक्त करने के लिए अदालत के दरवाजे पर खड़े होते हैं, न कि युद्ध के मैदान में। यह विरोधाभास न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की जाँच का मामला भी बन गया है।
उपभोक्ताओं और नागरिक समाज के दबाव को देखते हुए, कई मीडिया संस्थानों ने ‘रक्षा निधि’ की पहल की है, पर यह केवल अस्थायी राहत है। वास्तविक सुधार के लिए विधायी बदलाव, पुलिस प्रशिक्षण, और स्वतंत्र जांच आयोग की स्थापना आवश्यक है—ऐसे कदमों की कमी में सरकार की “पॉज़िटिव इमेज” केवल शब्दों में ही रहेगी।
पोप के सम्मानार्थ भाषण ने पत्रकारों के बलिदान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया, पर भारतीय राजनीति में इस सम्मान को वास्तविक कार्य में बदलना अभी भी एक लंबा सफ़र है। समय है कि नीति निर्माताओं को केवल बैनर नहीं, बल्कि ठोस सुरक्षा और स्वतंत्रता के आधारभूत ढाँचे बनाकर पेश किए गये वादों को साकार करना चाहिए, नहीं तो विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक अर्थ ही खो जाएगा।
Published: May 3, 2026