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वायुमण्डलीय संकट के सामने राजनीतिक कमियां: भारत में चुनावी मंच पर जलवायु नीति का वास्तविक मूल्यांकन
जलवायु परिवर्तन का मुद्दा अब केवल वैज्ञानिक गद्य नहीं रहा; यह चुनावी राजनीति का अभिन्न भाग बन चुका है। यूके में लेबर पार्टी ने हालिया अभियान में यह दावा किया कि वह ही एकमात्र पार्टी है जो जलवायु संकट को गंभीरता से लेती है। जबकि इस बयान का मूल उद्देश्य ब्रिटिश मतदाताओं को संबोधित करना था, भारत में भी इसी तरह का तर्क विपक्ष और सरकार दोनों द्वारा अपनाया जा रहा है।
लेबर के जलवायु मंत्री के रूप में सेवा करने वाली किटी व्हाइट ने कहा कि "दुर्लभ और खतरनाक तरीकों से हम ग्रह को बदल रहे हैं, और कोई भी इससे बच नहीं सकता"—यह शब्द थैचर के 1989 के यूएन भाषण से उधार लिये गये हैं, जो इस बात को रेखांकित करते हैं कि जलवायु जोखिम के सामने राजनीतिक बहस का कोई वैध बहाना नहीं है। भारत में, जहाँ हर साल मौसमी आपदाओं की लागत लाखों करोड़ों में पहुँचती है, ऐसा रुख सत्ता और विरोधी दोनों के लिए चुनौतियों का पैकेज पेश करता है।
वर्तमान में केंद्र सरकार ने कई शीतलन‑ऊर्जा योजनाएँ पेश की हैं, जैसे कि राष्ट्रीय सौर मिशन, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) प्रोत्साहन, और ग्रीन हाइड्रोजन पहल। हालांकि इन नीतियों का दायरे अक्सर औपचारिक रिपोर्टों तक ही सीमित रहता है, जबकि भूमि अधिग्रहण, अस्थायी कुशलता, और स्थानीय स्तर पर ठोस कार्यान्वयन में गंभीर अंतर रहता है। कई राज्य सरकारें, विशेषकर उत्तर-पूर्व में, तेज गति से सौर पैनल स्थापित करने के वादे को लेकर चुनौतियों का सामना कर रही हैं, जहाँ जमीन की उपलब्धता, शहरी नियोजन और स्थानीय विरोध एक साथ टकराते हैं।
विपक्षी दल, विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, ने हाल में ही यह दावा किया कि वह सरकार की जलवायु नीतियों को "आधारहीन शब्दों में घुंधली" कर रही है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि "फिजूल खर्ची और बड़े‑बड़े घोषणापत्र के पीछे असली कार्य नहीं दिखता, जबकि आम जनता को जल‑संकट, धूप‑धुंध और अस्थिर मौसम से रोज़ सामना करना पड़ता है।" यह आलोचना भारत के चुनावी माहौल में काफी प्रभावी हो सकती है, क्योंकि जलवायु‑संबंधी आपदाएँ (जैसे 2023 के हरियाणा‑पंजाब में बाढ़) चुनावी परिणामों को बदलने में सक्षम रही हैं।
वास्तविकता यह है कि जलवायु नीति का प्रभाव केवल बड़े‑पैमाने के प्रोजेक्टों में नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासनिक जवाबदेही में भी निहित है। कई नगर पालिकाएँ अभी भी अवैध ढंग से कोयला‑आधारित पावर प्लांटों को संचालित कर रही हैं, जबकि उनके पास सौर‑ऊर्जा के विकल्प उपलब्ध हैं। यदि केंद्र का नारा "पर्यावरणीय सुरक्षा, आर्थिक विकास के साथ" है, तो उसके कार्यान्वयन में टकराव क्षमता सिद्ध नहीं हुई है।
प्रमुख मुद्दा यह बनी हुई अड़चन है कि पर्यावरणीय चलनी (पॉलिसी) को अक्सर राजनीतिक गणित के साथ जोड़ दिया जाता है। जब चुनावी कामकाज के लिए तत्काल लोकप्रिय उपायों की आवश्यकता होती है, तो दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्य पीछे धकेल दिए जाते हैं। इस संदर्भ में, यूके के लेबर की रणनीति को भारतीय राजनीति में दोहराना आसान नहीं है, क्योंकि यहाँ के बहुस्तरीय संघीय ढाँचे में नीति‑निर्माण की गति धीमी और जटिल है।
आखिरकार, जलवायु कोर संकट पर कोई भी पार्टी "केवल शब्दों में ही नहीं", बल्कि ठोस कार्य, पारदर्शी बजट आवंटन, और जन-जन तक पहुंच वाले कार्यक्रमों के माध्यम से साबित कर सकती है कि वह इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। चुनाव के निकट आते ही यह देखना होगा कि कौन‑सी पार्टी जलवायु नीति को राजनीतिक मुद्दा बनाते हुए भी वास्तविक बदलाव लाने में सक्षम है, और कौन‑सी केवल चुनावी बिंदु के रूप में इसका उपयोग कर रही है।
Published: May 6, 2026