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विदेश विभाग में कंज़रवेटिव समूह का बढ़ता प्रभाव: प्रोडाइवर्सिटी नीतियों को खतरा
संयुक्त राज्य विदेश विभाग में हाल ही में उभरते कंज़रवेटिव समूह की भूमिका को लेकर चिंता की लहर तेज हो गई है। इस समूह के संस्थापकों ने "बेन फ्रैंकलिन फेलोशिप" के नाम से एक नेटवर्क स्थापित किया है, जिसका लक्ष्य विभाग के भीतर स्थापित प्रोडाइवर्सिटी और समावेशी उपायों को ध्वस्त करना तथा उन करियर राजनयिकों को बढ़ावा देना है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के विचारधारा के अनुरूप कार्य करते हैं।
समूह के प्रमुख सदस्यों के अनुसार, प्रोडाइवर्सिटी पहलें विदेश विभाग की कार्यकुशलता को बाधित कर रही हैं और अमेरिकी विदेश नीति को "अत्यधिक सामाजिक एजींडा" के जाल में फँसा रही हैं। वे इस बात को लेकर आग्रही हैं कि उन पदों पर अनुभवी राजनयिकों को नियुक्त किया जाए जो राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए ट्रम्प की "अमेरिका फर्स्ट" नीति को आगे बढ़ा सकें।
इन आरोपों के प्रतिवाद में विभाग के वरिष्ठ प्रबंधन ने कहा कि विविधता‑समावेशी कार्यक्रमों ने कार्यस्थल में नवाचार और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा दिया है, जिससे अमेरिकी कूटनीति की प्रभावशीलता में सुधार आया है। उन्होंने बेन फ्रैंकलिन फेलोशिप को "व्यक्तिगत विचारधाराओं के लिये एक मंच" कहा, परन्तु कहा कि किसी भी समूह का सार्वजनिक नीति को आकार देने में अनुचित हदें पार नहीं करनी चाहिए।
संसदीय तटस्थता वाले सांसदों ने इस विकास पर सवाल उठाते हुए कहा कि विदेश विभाग की स्वायत्तता को राजनीतिक दबाव से बचाना आवश्यक है, विशेषकर जब ऐसी पहलें अंतरराष्ट्रीय अमन व सहयोग को प्रभावित कर सकती हैं। विपक्षी दलों ने इसको "सत्तावादी दखल" के रूप में लेबल किया और प्रशासन से पारदर्शिता तथा शासकीय जवाबदेही की मांग की।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कंज़रवेटिव समूह की प्रेरणा के तहत पदोन्नति और नियुक्तियों में बदलाव लाया गया, तो न केवल अमेरिकी विदेश नीति के मूलभूत सिद्धांतों में परिवर्तन आएगा, बल्कि भारत‑अमेरिका संबंधों में भी अनिश्चितता उत्पन्न हो सकती है। भारत के विदेश मंत्रालय को अब इस परिवर्तित माहौल में अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को पुनः परखना पड़ सकता है, खासकर चीन के प्रति संतुलित रुख और क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों में।
विचारधारा‑आधारित नियुक्तियों की बढ़ती प्रवृत्ति ने फिर से एक बार प्रशासनिक जवाबदेही और नीति‑निर्माण में पेशेवरता के बीच तनाव को उजागर किया है। ऐसे में यह देखना रहेगा कि अमेरिकी केंद्र में इस गठबंधन का भविष्य में क्या असर पड़ेगा और यह भारत की कूटनीतिक गणना‑पात्रताओं को कैसे प्रभावित करेगा।
Published: May 6, 2026