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Category: राजनीति

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लीडर को ‘क्रिप्टोनाइट’ मानते पार्टी की चुनावी रणनीति: केयर स्टार्मर को कैसे बनायीं निष्क्रिय

विक्टोरिया कोविंटले के दफ़्तर में तभी चुप्पी रही, जब शांति को बनाए रखने की कोशिश में, वरिष्ठ समर्थकों को भी ‘दुर्लभ’ वाक्यों के साथ काम करने पर मजबूर किया गया। यह वही पक्षीय माहौल था, जहाँ अभिव्यक्तियों को त्रुटिपूर्ण माना गया और मुख्य नेता के नाम को उल्लेख ही नहीं किया जाता था। यह रणनीति, जिसका मूल कारण मतदान आंकड़े थे, भारतीय राजनीति में अक्सर दोहराया जाता है, जहाँ एक प्रमुख नेता को ‘वोटों की क्षति’ के रूप में अंकित कर पार्टी‑केन्द्रित अभियानों को पुनः रूप‑निर्धारित किया जाता है।

केयर स्टार्मर, ब्रिटिश लेबर के नेता, हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, कई मतदाताओं के लिए ‘कृप्टोनाइट’ बन चुके थे। उनका नाम सुनते ही, ध्वनि‑संज्ञान से जुड़ी नकारात्मक प्रतिक्रिया – यहाँ तक कि हाथ‑उपर‑विचार के समान संकेत – दर्ज की गई। इस कारण, पार्टी के प्रबंधक ने एक अनूठी रणनीति अपनाई: स्टार्मर को मंच से दूर रखकर उसकी सोच को ‘अमूर्त विचार’ के रूप में प्रस्तुत करना। इस दृष्टिकोण ने यह सवाल उठाया कि क्या किसी नेता को पूरी तरह से छिपाना, जनता के साथ सच्ची संवाद को नहीं नुकसान पहुँचाता?

इस अराजक खेल में, पॅट मैकफ़ैडन को ‘सच्चा विश्वासी’ के रूप में भेजा गया, ताकि वह स्टार्मर को बचा सके। उनका कार्य, जिसमें मीडिया और स्थानीय अभियानों में नेता का समर्थन करना शामिल था, अब भारत में देखी गई कई स्थितियों के समान लगती है – जहाँ एक वफ़ादार दल के भीतर के नेता को बचाने के लिए विशेष गठबंधन बनते हैं, परन्तु सार्वजनिक हित के बजाय पार्टी‑केन्द्रित बचाव ही प्राथमिकता बन जाता है।

ऐसे कदमों से दो प्रमुख प्रश्न उठते हैं: पहला, क्या एख़ नेता का ‘कंट्रोल्ड इमेज’ चुनावी जीत के साथ तकनीकी रूप से न्यायसंगत है, या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है? दूसरा, जब पार्टी शीर्षस्तरीय नेता को ‘खतरे’ मानती है, तो यह संकेत देता है कि आंतरिक मतभेद और रणनीतिक असहमति किस हद तक शासन के निरंतरता को प्रभावित करती है। भारतीय राजनीति में भी, समान रणनीतियों ने अक्सर चुनावी परिणामों को निर्धारित किया है, परन्तु दीर्घकालिक नीति‑निर्माण और सार्वजनिक भरोसे को नज़रअंदाज़ किया गया।

पार्टी के भीतर यह ‘क्रिप्टोनाइट’ को बाहर निकालने की कोशिश, न केवल एक व्यावहारिक झूठ को सुदृढ़ करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सत्ता कैसे ‘सामान्य जनता की माँग’ को दबा कर निरंतर सत्ता की खोज में फँस जाती है। जनता को अब यह décider करना होगा कि क्या वह केवल चुनावी ‘छद्म‑रक्षा’ के प्रति सहनशील है, या वह असली जवाबदेही, पारदर्शिता और नीतियों की वास्तविक प्रभावशीलता की माँग करता है।

Published: May 6, 2026