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Category: राजनीति

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रवांडा में एंप्युटी फुटबॉल की सफलता: भारत की दिव्यांग खेल नीति पर सवाल उठते हैं

रवांडा में एंप्युटी फुटबॉल ने पिछले दो वर्षों में न केवल मैदान पर प्रतिस्पर्धा को बहाल किया है, बल्कि सामाजिक पुनर्संरचना और राष्ट्रीय एकता के नए मॉडल के रूप में भी काम कर रहा है। दुर्लभ चोटों से ग्रस्त खिलाड़ी और गृह युद्ध के शिकार बचे लोग, अब इस खेल के माध्यम से भेदभाव‑पर्यंत की दीवारें तोड़ रहे हैं, यह पहल इंटीरियर मंत्रालय की एथलेटिक पहल और अंतरराष्ट्रीय विकास साझेदारी की दोहरी सफलता के रूप में देखी जा रही है।

इसी समय भारत में दिव्यांग खिलाड़ी‑समुदाय को समान अवसर प्रदान करने की नीति पर सवाल उठ रहे हैं। खेल मंत्रालय की 2024 की ‘समावेशी खेल योजना’ के बावजूद, देश में एंप्युटी फुटबॉल जैसी व्यवस्थित तकनीकी और बुनियादी ढाँचा अभाव है। विपक्षी दलों ने लगातार संसद में इस अंतर को उजागर किया, यह तर्क देते हुए कि भारत‑रवांडा रणनीतिक साझेदारी को केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित रखना, सामाजिक‑खेल पहल में संभावित निर्यात‑उपयोग को रोका है।

रवांडा सरकार ने एंप्युटी फुटबॉल को राष्ट्रीय पुनर्संरचना कार्यक्रम के अभिन्न अंग के रूप में पेश किया। सरकारी निधि, स्थानीय NGOs, और चाइना‑अफ़्रीका खेल एक्सचेंज के सहयोग से 12 क्लबों ने लीग का विस्तार किया, जिसके परिणामस्वरूप 2025 में 150 से अधिक खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं। इस मॉडल पर भारत के कोहली‑नीति सलाहकार समूह ने सावधानीपूर्वक नज़र रखी है, क्योंकि यह दिखाता है कि सीमित संसाधनों से भी सामाजिक जुड़ाव कैसे पैदा किया जा सकता है।

हालाँकि, भारत के केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधियों ने अभी तक इस पर कोई ठोस टिप्पणी नहीं की है। आधिकारिक तौर पर उन्होंने कहा कि विदेशी मॉडल की नकल “स्थानिक जरूरतों के अनुसार” की जाएगी, जबकि विपक्ष ने इस उत्तर को ‘उदासीनता’ और ‘नीति‑विलंब’ के रूप में लेबल किया। कुछ सांसदों ने राजस्व‑आधारित खेल कार्यक्रम के बजट में 15% की वृद्धि की मांग की है, ताकि एंप्युटी फुटबॉल, बॉडिज़, और पैरेलिंपिक के लिए विशेष सुविधाएँ प्रदान की जा सकें।

सार्वजनिक हित की बात की जाए तो इस प्रकार के खेल न केवल शारीरिक सशक्तिकरण प्रदान करते हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, रोजगार संभावनाओं, और सामाजिक समावेशन को भी बढ़ावा देते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों ने कहा है कि दिव्यांग खेलों में निवेश ‘रोग‑विज्ञान’ की तुलना में अधिक रिटर्न देता है। रवांडा का उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है कि यदि नीति‑निर्माताओं ने राजस्व‑आधारित खेल बजट को सामाजिक-आधारित प्रभाव के साथ मिलाया, तो भारत में समान चुनौतियों का सामना करने वाले लाखों नागरिकों को लाभ हो सकता है।

भविष्य में, यदि भारतीय सरकार रवांडा के एंप्युटी फुटबॉल मॉडल को अपनाने में सक्रिय कदम नहीं उठाती, तो वह न केवल अंतरराष्ट्रीय समावेशी खेल मंच में अपना स्थान खो सकती है, बल्कि घरेलू स्तर पर दिव्यांग समुदाय के उल्लंघन की बढ़ती आवाज़ का सामना भी करेगी। इस स्थिति को सुधारने के लिए आने वाले चुनावी वर्ष में यह मुद्दा मुख्य राजनीतिक बहस बन सकता है, जहाँ करदाता के पैसे की प्राथमिकता को ‘वास्तविक शक्ति‑निर्माण’ के रूप में सिद्ध किया जाना आवश्यक होगा।

Published: May 6, 2026