रूस‑यूक्रेन शांति प्रस्तावों के बीच भारत की विदेश नीति पर सवाल
मॉस्को ने 9 मई को आधिकारिक रूप से एक सैन्य विराम की घोषणा की, अपनी विजय दिवस की प्रतीकात्मकता को ‘स्थायी शांति’ के इशारे में बदलते हुए। जबकि कीव एक अलग परिदृश्य पेश कर रही है: यूक्रेनी अधिकारियों ने कहा कि रूसी सेना ‘ड्रोन के डर’ से जूझ रही है, और इस को पेश कर रहे हैं अपने मनोबल को ऊँचा करने की कोशिश। यह दोहरी कथा अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिर से दिखा रही है कि संघर्ष के किस चरण में कौन किसे अपने पक्ष में लाने की कोशिश करता है।
भारत के लिए इस मौजूदा गतिशीलता के कई आयाम हैं, जो न केवल कूटनीतिक दृष्टिकोण से बल्कि घरेलू राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भी महत्वपूर्ण बनते हैं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली पहल ने लगातार रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी को ‘लगातार वफादारी’ के रूप में प्रस्तुत किया है—जैसे कि रक्षा उपकरण, एनीजॉइंट परमाणु ऊर्जा और ऊर्जा आयात में. इस नई ‘शांति’ सौदेबाजी को सरकार ने अभी‑तक वैधता देने में कोई संकोच नहीं दिखाया, जबकि विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और कुछ राज्य स्तर के विपक्षी गठबंधन, ने इसे ‘वास्तविकता से दूर’ होने का आरोप लगाया है।
विशेष रूप से, संसद में हाल ही में हुए बहस में कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद ने सवाल उठाया कि यदि रूस का ‘विजय दिवस’ अब शांति घोषणा से जुड़ा है, तो क्या यह भारत के रूसी-निर्मित टैंकों और विमान प्रणालियों की आपूर्ति को अस्थिर कर देगा? वर्तमान में, कई भारत‑रूस रक्षा समझौते—जैसे कि साकी‑ए त्रिलॉजी हेलीकॉप्टर अपडेट और अग्निकुंडी‑रॉकेट‑प्रणाली—‘विनियमित’ (intermediate) चरण में हैं। यदि वार्ता‑टेबल पर नई शर्तें लगायीँ जाती हैं, तो भारतीय रक्षा उत्पादन योजना और ‘Make in India’ रणनीति पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर, यूक्रेन की ड्रोन‑भय की चर्चा, जिसे वह अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ‘रशिया का अभिप्राय’ कह कर पेश कर रहा है, भारत में भी खबरों की सन्दुता को तेज कर रही है। कई विशेषज्ञों ने बताया कि एयर‑ड्रोन तकनीक में भारत की ‘स्वदेशी’ पहल अभी प्रारम्भिक चरण में है, और वह लेकर रूस पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहा है। परंतु विरोधी पक्ष का तर्क है कि इस तरह की स्थिति में सरकार को अपने ‘रक्षा‑स्वावलंबन’ के प्रतिज्ञा पर पुनर्विचार करना चाहिए, न कि केवल विदेश नीति के चेहरे को चमकाने के लिये रशिया के ‘मेंडेट’ को प्राथमिकता देनी चाहिए।
ऐसे माहौल में, आगामी 2026 के राज्य‑चुनाव और संभावित केंद्र‑सत्रीय चुनावों में यह मुद्दा ‘मतदान‑विचार’ बनकर उभर सकता है। चुनावी प्रचार में सरकार अक्सर ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के दावे को दोहराती है, जबकि वास्तविकता में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विवादों में भारत की स्थिति को संतुलित करने की नौकरशाही जटिलता से निपटना पड़ता है। विपक्षी समूह इन दावों को ‘राजनीतिक कूटनीति’ कह कर चुनौती दे रहे हैं, यह सुझाव देते हुए कि ‘किसी भी मित्र राष्ट्र के संघर्ष में बिना जाँच‑परख के समर्थन’ राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हो सकता है।
सार्वजनिक हित के दृष्टिकोण से, रूसी प्राकृतिक गैस की आयात पर भारत का निर्भरता दो साल से अधिक समय से सतत चर्चा का विषय रही है। यदि मॉस्को के ‘विराम’ के बाद भी आर्थिक प्रतिबंध बरकरार रहते हैं, तो भारत के ऊर्जा‑सुरक्षा नीति को पुनः विचार करने की आवश्यकता हो सकती है। यह न सिर्फ उद्योग‑संविदान को प्रभावित करेगा, बल्कि सामान्य उपभोक्ता की बिजली की कीमतों और एटीएम‑उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है।
समग्र रूप से देखें तो रूस‑यूक्रेन के बीच विकसित होते शांति‑परिदृश्य ने भारतीय सरकार को दोहरी जाँच‑पड़ताल के दायरे में धकेल दिया है। एक तरफ, लंबे समय से स्थापित रक्षा‑साझेदारी को निरंतरता देना है; दूसरी तरफ, ‘ड्रोन‑भय’ जैसी नई सूचना‑युग की रणनीति को समझना और देश के ‘स्वदेशी‑रेडार’ और ‘ड्रोन‑इंडस्ट्री’ को सुदृढ़ बनाना है। इस पहिये के दोनो किनारों पर, विपक्षी धड़कनों की आवाज़ें सिर्फ शब्दों की ‘उत्पीड़न’ नहीं, बल्कि वास्तविक नीति‑पुनर्मूल्यांकन की मांग भी बन चुकी हैं। आशा है कि आने वाले महीनों में भारतीय संसद, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय मिलकर इस जटिल अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को स्पष्ट, पारदर्शी और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ढाल पाएँ।
Published: May 5, 2026