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Category: राजनीति

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रोबोट भिक्षु का आगमन: तकनीकी‑धर्म के संगम पर भारतीय नीति की परीक्षा

सियोल के एक बौद्ध मठ ने दक्षिण कोरिया का पहला मानवाकार रोबोट भिक्षु पेश किया, जिसने धर्मिक अनुष्ठान में एआई का प्रयोग कर आध्यात्मिक वातावरण को बदलने का दावा किया। इस कदम ने विश्वभर में, विशेषकर भारत में, तकनीकी नवाचार और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संभावित टकराव पर सवाल उठाए हैं।

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में ‘डिजिटल इंडिया’ एवं ‘त्रि‑विन्यास एआई नीति’ के तहत रोबोटिक्स और मशीन लर्निंग को जीवन के कई क्षेत्रों में लागू करने की दिशा में कई योजनाएँ घोषित की हैं। लेकिन धार्मिक संस्थानों में ऐसे स्वायत्त प्रणाली के उपयोग को लेकर नियम‑निर्माण अभी भी अधीरता से चल रहा है। विरोधी दल और कईधर्मी समूह इसे धार्मिक शुद्धता के लिए जोखिम मानते हुए, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक आत्मा पर असर के रूप में देखते हैं।

रिपोर्टों से पता चलता है कि रोबोट भिक्षु को ध्वनि पहचान, भावनात्मक अभिव्यक्ति और शास्त्रीय पाठों की पुनरावृत्ति करने के लिए प्रोग्राम किया गया है। यदि ऐसी तकनीक भारत में प्रवेश कर बौद्ध, हिंदू या किसी अन्य धार्मिक स्थल में अपनाई जाये, तो इसका उपयोग किस हद तक मानवीय परम्पराओं की जगह लेगा, इस पर स्पष्ट नीतिगत दिशा‑निर्देश की कमी स्पष्ट होती है। मौजूदा एआई नियमन केवल डेटा सुरक्षा और उद्योग विकास पर केंद्रित है, जबकि धार्मिक सन्दर्भ में नैतिक मानकों की परिभाषा अभी भी अस्पष्ट है।

विपक्षी दल ने इस अंतर को सरकार की असमानता के रूप में उजागर किया। वे तर्क देते हैं कि तकनीकी लाभ तो बड़े शहरी केन्द्रों में पहुँच रहे हैं, जबकि ग्रामीण और धार्मिक क्षेत्रों में नियम‑बिना प्रयोग संभावित सामाजिक अशांतियों को जन्म दे सकता है। इसके अलावा, कई धर्मशास्त्री यह चेतावनी दे रहे हैं कि भगवान के रूप में रोबोट को प्रतिष्ठित करना, चाहे वह अनुकरणीय ही क्यों न हो, मानवता के आत्म‑संवेदन को कमज़ोर कर सकता है।

ऐसी ही दुविधा को देखते हुए, वरिष्ठ नीति विशेषज्ञों ने सरकार से ‘धर्म‑तकनीक गठबंधन नियमावली’ का मसौदा तैयार करने का आग्रह किया है। इस प्रस्ताव में रोबोटिक प्रतिनिधियों की प्रमाणिकता, उपयोग सीमाएँ, सार्वजनिक निरीक्षण तंत्र और धार्मिक संस्थानों के साथ परामर्श प्रक्रिया को तय किया गया है। यदि सरकार इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाती, तो भविष्य में तकनीक‑आधारित धार्मिक मंचों के दुरुपयोग की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं।

सियोल की इस प्रयोगात्मक पहल ने भारतीय श्रोताओं को यह सोचने पर मजबूर किया है कि तकनीक जब धर्म के साथ मिलती है, तो नीति‑निर्माताओं को न केवल आर्थिक या सुरक्षा पहलुओं को, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रामाणिकता को भी संतुलित करना होगा। समय यह तय करेगा कि भारत इस नयी सायबर‑धार्मिक लहर में कितनी सावधानी और दूरदर्शिता दिखाता है।

Published: May 7, 2026