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Category: राजनीति

रिन्युएबल ऊर्जा पर सब्सिडी हटाने की योजना से यूके में ट्रस‑जैसी आर्थिक अराजकता, भारतीय नीति निर्माताओं को चेतावनी

लंदन पर बैठी लहरें अब फिर से तीव्र हो रही हैं। यूके की छोटे‑पार्टियों में से रिफॉर्म यूके के प्रमुख नेता नाइजल फारेज ने अपनी गठबंधन सरकार में एक बेतहाशा कदम का मीटिंग एजेन्डा रखा है – नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं से सब्सिडी अनुबंधों को हटा‑देना। इस प्रस्ताव को लागू करने पर देश को लिज़ टरस के 2022‑23 के आर्थिक संकट जैसा ‘ट्रस‑स्टाइल’ अराजकता झेलनी पड़ सकती है, इस बात की चेतावनी रिन्युएबल यूके (RenewableUK) के प्रमुख लॉबिस्ट तारा सिंह ने दी।

सिंह, जो उद्योग के सबसे बड़े प्रतिनिधि संगठनों में से एक के नए मुख्य कार्यकारी हैं, ने कहा कि "जब सब्सिडी को हटाकर अनिश्चितता पैदा की जाएगी, तो न केवल नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र बल्कि पूँजी बाजार, रोजगार और देश की अनुदान‑आधारित निवेश भावना पर भी गहरा असर पड़ेगा"। उन्होंने यह भी जोड़ते हुए बताया कि यूके में इस साल के प्रारंभिक आर्थिक आंकड़े पहले ही संकेत दे रहे हैं कि मौद्रिक नीति में अचानक बदलाव निवेशकों की भरोसेमंदता को धूमिल कर सकते हैं।

यहां तक कि सरकार‑विरोधी समूह और विपक्षी दल भी इस उपाय को "धोखा" और "अस्थिरता का निमंत्रण" का लाँच मानते हैं। कई कांग्रेस के सदस्य इस बात पर सराहना कर रहे हैं कि रे‑ऐनर्जी क्षेत्रों में लगाए गए सब्सिडी ने 2020 के बाद से औसत वार्षिक 3.5% ग्रोथ को सुगम बनाया है, जबकि स्वच्छ ऊर्जा के लिए वित्तीय समर्थन में कटौती से इस गति रुक सकती है।

भारत के नीति निर्माताओं के लिए यह विकास केवल एक दूरस्थ यूरोपीय मामला नहीं है। देश के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य (2030 तक 500 GW) के लिये सब्सिडी‑आधारित मॉडल पर काफी हद तक निर्भरता है। यदि यूके में सब्सिडी हटाने से वित्तीय मंडलों में घबराहट फैली, तो भारतीय निवेशकों के लिए भी एक चेतावनी का हाथ बन सकता है – खासकर जब भारतीय सरकार भी बाजार‑आधारित सुधारों को तेज करने की योजना बना रही है।

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि रिफॉर्म यूके का यह कदम, अगर लागू हुआ, तो यूके के गोल्ड मानक में विदेशी निवेशकों की श्रृंखलाबद्ध निकासी को प्रेरित कर सकता है, जिससे पॉवर्ड‑बाई‑देविल के साथ‑साथ यूरोपीय सौर‑और पवन‑फार्मों की फंडिंग भी कमज़ोर पड़ेगी। इससे तकनीकी निर्यात, रोजगार और ग्रिड स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा – जिससे यूके का ही नहीं, बल्कि विश्वभर के अक्षय ऊर्जा अवसंरचना पर धुंधला असर पड़ेगा।

सरकार ने इस बिंदु पर अभी तक स्पष्ट जवाब नहीं दिया है, परंतु वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि "सब्सिडी की समीक्षा चल रही है, परंतु कोई भी निर्णय राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को जोखिम में नहीं डाल सकता"। यह बयान कई आलोचकों को पर्याप्त नहीं लगा, जिन्होंने कहा कि नीति का दायरा और उसके संभावित सामाजिक‑आर्थिक परिणामों का विस्तृत आकलन अभी बाकी है।

भविष्य की राह अभी अनिश्चित है, परंतु यूके में चल रहे इस बहस से यह स्पष्ट हो रहा है कि नवीकरणीय ऊर्जा पर सब्सिडी हटाना केवल आर्थिक आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, निवेशस्थिरता और सतत विकास के मूल सिद्धांतों पर प्रश्न उठाता है। भारतीय नीति निर्माताओं के लिये यह एक महत्वपूर्ण संकेत है: यदि सब्सिडी‑रिकवरी को जल्दी‑जल्दी अपनाया गया, तो संभावित अराजकता से बचने के लिये व्यापक परामर्श, बहु‑संकायियों का मूल्यांकन और निरंतर सार्वजनिक संवाद अनिवार्य होगा।

Published: May 4, 2026