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Category: राजनीति

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युसीएलए मेडिकल स्कूल पर सफेद व एशियाई आवेदकों के विरुद्ध भेदभाव का आरोप, भारत में आरक्षण‑मेरिट बहस फिर से तपा

संयुक्त राज्य अमेरिका के न्याय विभाग ने कल लॉस‑ऐंजेलिस के युसीएलए मेडिकल स्कूल पर सफेद और एशियाई वर्ग के आरोजगारियों के विरुद्ध भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए, 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को फिर से याद किया, जिसमें जाति‑आधारित छूट को रद्द कर दिया गया था। इस कदम ने कई भारतीय राजनीतिक विश्लेषकों को आरक्षण, मेरिट और सामाजिक न्याय के गहन प्रश्नों के सामने खड़ा कर दिया।

उल्लेखित निर्णय के बाद, यूसीएलए ने बार‑बार कहा कि वह "सर्वोच्च योग्यता" के आधार पर चयन करता है। फिर भी, अमेरिकी एजेंसी ने यह दावा किया कि विश्वविद्यालय द्वारा उपयोग किए जा रहे मानदंड वास्तव में निचले वर्ग के उम्मीदवारों को पसंद करते हैं, जिससे सफेद व एशियाई अभ्यर्थियों को असमानता का सामना करना पड़ रहा है।

भारत में, इस खबर को लगभग उसी स्वर में सुना गया है जैसे राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण‑मेरिट की बहस चल रही है। उत्तर-दक्षिण, क्रमशः मुद्दे को वैकल्पिक सामाजिक‑आर्थिक पृष्ठभूमियों, जातीय मानदंडों और शिक्षा‑उपलब्धि पर अद्यतन करने की मांगें मिलती हैं। प्रधान मंत्री के नीचे बहुपक्षीय आरक्षण नीति को लेकर कांग्रेस, पेटीएम और कई राज्य‑स्तर के दलों ने लगातार कहा है कि "उच्चतम मानकों" की रक्षा करना ही प्रगति का सच्चा मार्ग है, जबकि विपक्षी आवाज़ें अक्सर इसे "उच्च वर्ग के अधिकारों" के दावे के रूप में रेखांकित करती हैं।

वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में "सर्वोत्तम योग्यता" सिद्धांत पर पुनर्विचार का आदेश दिया था, पर इसके बाद भी उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक‑आर्थिक वर्ग के आधार पर चयन परिलक्षित होता है। इस संदर्भ में, यूसीएलए के मामले को देखकर भारतीय प्रशासकों पर सवाल उठता है: क्या आरक्षण प्रणाली में संतुलन बनाने के लिये मात्र अंकीय मानदंड पर्याप्त हैं, या सामाजिक समावेशन के लिये निरंतर "प्लस‑पॉइंट" प्रणाली अनिवार्य है?

सरकारी रणनीति के हिस्से के रूप में, केंद्रीय सरकार ने हाल ही में आरक्षण के दायरे को विस्तारित करने के लिए नई नियमावली का प्रस्ताव दिया है, जिसका उद्देश्य आर्थिक पिछड़े वर्गों को प्राथमिकता देना है। परंतु यह प्रस्ताव विपक्षी दलों द्वारा "परिणामों के बजाय भावनाओं पर खेलना" कहा गया है, और कई शैक्षणिक संस्थानों ने इसे "शिक्षा के मूलभूत सिद्धांतों पर आक्रमण" के रूप में खारिज कर दिया है।

जैसे ही अमेरिकी न्याय विभाग यूसीएलए के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू कर रहा है, भारतीय राजनीति में इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय मुकदमों को अक्सर "उदाहरण" के रूप में इस्तेमाल किया जाता है— कि कैसे सामाजिक समानता के नाम पर नियामक संस्थाएँ भी कभी‑कभी "उच्चतम योग्यता" के सिद्धांतों को नजरअंदाज कर देती हैं। यह दृष्टिकोण, जबकि कुछ मामलों में सटीक हो सकता है, परंतु भारतीय संदर्भ में आरक्षण की जटिल सामाजिक-आर्थिक जड़ें, जाति‑संबंधी असमानताओं और ऐतिहासिक असमानता को पूरी तरह नहीं पकड़ पाता।

सार में, यूसीएलए पर लगाए गए आरोप न केवल एक विश्वविद्यालयीय प्रशासनिक त्रुटि को उजागर करते हैं, बल्कि भारत में आरक्षण‑मेरिट के बंधन को फिर से परखने का एक नया मंच खोलते हैं। क्या नीति निर्माताओं को "साक्षरता का विस्तार" के साथ‑साथ "उच्चतम मानदंडों" के संरक्षण की दोहरी दिशा में काम करना होगा, या फिर सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिये मौजूदा मानदंडों को पूरी तरह बदलना पड़ेगा— यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है।

Published: May 7, 2026