यूवन की जीत पर सरकार की खेल नीति को मिला कड़ी पड़ताल
मैनचेस्टर यूनाइटेड ने लिवरपूल को 3-2 से हराकर चैंपियंस लीग क्वालिफिकेशन सुरक्षित किया, जबकि कोबी मेनू का देर से किया गया निर्णायक गोल मैच को नाटकीय मोड़ पर ले गया। भारत में फुटबॉल का फुहारा पहले ही जल रहा है, पर इस जीत से उत्पन्न राजनीतिक बहसें खेल‑व्यवस्थापन की गहरी खामियों को उजागर कर रही हैं।
दिल्ली के प्रधान मंत्री ने हाल ही में राष्ट्रीय खेल नीति में "सभी के लिए खेल" का मंत्र दोहराते हुए क्रीड़ा बुनियादी ढाँचे को दोगुना करने की घोषणा की थी। परन्तु यूरोपीय लीग में इस तरह के बड़े वित्तीय दांव और स्टेडियम सुरक्षा मानकों को देख कर सवाल उठता है कि भारत में सरकारी फंड का प्रावधान कितनी तेज़ी से लागू हो रहा है। विपक्षी दलों ने लगातार कहा है कि उच्च‑स्तरीय फुटबॉल में निवेश को रणनीतिक रूप से नितारित करने के बजाय मनपसंद परियोजनाओं में फँसा दिया गया है।
विपक्षी नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (NDA) के प्रवक्ता ने कहा, "जब यूरोप में क्लबों को करोड़ों की बिक्री और टेलीविजन अधिकारों से राजस्व मिल रहा है, तो भारत सरकार का अब तक केवल 500 करोड़ रुपये का फुटबॉल विकास फंड बकाया है, यह स्पष्ट दर्शाता है कि नीति‑निर्माण में प्राथमिकता नहीं, बल्कि शब्दों का ताबीज़ है।" वहीं सत्ता‑सम्पन्न राष्ट्रीय जनआंदोलन (NJP) ने दावा किया कि उनका नया खेल‑विकास पैकेज पिछले वर्ष के बजट में ही 1,200 करोड़ रुपये आवंटित किया गया था, परन्तु वह भी कई जिलों में शीर्ष‑स्तरीय मैदान निर्माण की प्रक्रिया में अटक गया है।
यह प्रतिद्वंद्विता केवल आँकड़ाओं तक सीमित नहीं है; यह आम नागरिकों के भरोसे का सवाल भी है। पिछले महीने दिल्ली में आयोजित एक सार्वजनिक सर्वेक्षण में 62% उत्तरदाताओं ने कहा कि खेल‑बजट का प्रत्यक्ष लाभ उन्हें नहीं मिला, जबकि 48% ने कहा कि उच्च‑प्रोफ़ाइल अंतरराष्ट्रीय मैचों से प्रेरित होकर उन्होंने अपने बच्चों को फुटबॉल प्रशिक्षण देना शुरू किया है। इस पर प्रशासनिक जवाबदेही की मांग तेज़ी से बढ़ रही है।
उपभोक्ता मामलों की हाई कोर्ट ने भी इस साल दो बार इस बाबत आदेश जारी किए थे कि खेल‑अधिकारियों को स्थानीय क्लबों को वित्तीय सहायता का आँकड़ा सार्वजनिक करना अनिवार्य है। अब जब यूरोप में महंगे ट्रांसफर और टेलीविज़न डीलें खेल‑राजनीति का नया मॉडल बन रही हैं, तो भारत में खेल‑नीति के पुनरावलोकन की कसौटी पर यह मैच एक चेतावनी बनकर उभरा है।
आगे देखा जाए तो सरकार को मात्र जश्न मनाने के बजाय नीतियों में पारदर्शिता, बुनियादी ढाँचे में सुधार और grassroots‑लेवल पर सच्ची पहुँच सुनिश्चित करनी होगी, तभी भारत में फुटबॉल की जीत को राष्ट्रीय गर्व के रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक नीति‑सफलता के रूप में माना जा सकेगा।
Published: May 3, 2026