यूक्रेन‑रूस संघर्ष में ड्रोन हमले, भारतीय सरकार की ऊर्जा नीति पर सवाल
यूक्रेन के एक नाभिकीय संयंत्र पर ड्रोन द्वारा किए गए हमले और बाल्टिक समुद्र के एक प्रमुख तेल‑टर्मिनल के विनाश ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई अस्थिरता पैदा कर दी है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमीर ज़ेलेन्स्की ने इस कार्रवाई को ‘सफलता’ का श्रेय देते हुए पोर्ट के ‘ध्वंस’ की प्रशंसा की, जबकि रूसी अधिकारियों ने बढ़ती तेल कीमतों की चेतावनी दी। यह विकास न केवल यूरोपीय सुरक्षा दांव‑पेंच पर असर डालेगा, बल्कि भारत की ऊर्जा आयात‑निर्भरता को भी गहराई से प्रभावित करेगा।
भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस घटना पर तटस्थ प्रतिक्रिया दी है, पर कई विकल्पों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पहले ही समय में तेल के बढ़ते मूल्यों ने देश के महंगाई दर में इजाफा किया था; अब जब तेल की कीमतें दो अंकों में उछाल की संभावना पर हैं, तो मध्य‑वर्गीय परिवारों और छोटे व्यापारी वर्ग की असहनीय बोझ बढ़ेगा। ऐसे में प्रधानमंत्री की विदेश नीति, जो अक्सर ‘रशिया‑भारत संधि’ के ढाँचे में काम करती दिखती है, को फिर से तौलने की जरूरत है।
विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और AAP, इस मुद्दे को सरकारी ऊर्जा नीतियों की ‘विफलता’ के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले दो वर्षों में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में पर्याप्त निवेश नहीं किया, जबकि यूरोपीय देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाए हैं। विपक्ष का तर्क है कि ‘वर्तमान अस्थिरता के सामने, विदेशी तेल पर निर्भरता को घटाने के लिए जलवायु‑स्वच्छ योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए’, नहीं तो ‘तेल‑कीमतों की उछाल के साथ ही सार्वजनिक कल्याण पर गंभीर आघात होगा’।
सरकार ने उत्तर में कहा कि वह रणनीतिक तेल भंडार को पर्याप्त स्तर पर बनाए रखने के लिए ‘सभी आवश्यक कदम उठाएगी’। लेकिन इस बयान पर कई नीति विश्लेषकों ने संकेत दिया कि वास्तविक तैयारियों की स्थिति अभी भी अस्पष्ट है। राष्ट्रीय रणनीतिक तेल भंडार (NSRS) की क्षमता 10 मिलियन टन है, परन्तु पिछले बजट में इस भंडार का विस्तार करने के लिए कोई अतिरिक्त फंड आवंटित नहीं किया गया। साथ ही, घरेलू बायो‑डीज़ल और सौर ऊर्जा के लिए नियोजित प्रोत्साहन योजनाएँ अभी तक ‘विचारणीय’ चरण में हैं।
भू‑राजनीतिक स्तर पर भी सवाल उठ रहा है कि भारत का ‘रुक्ष’ रुख रूस‑मध्यम‑आधारित ऊर्जा समझौतों के प्रति कितना व्यावहारिक है। जब पश्चिमी राष्ट्र यूक्रेन को सैन्य‑सहायता दे रहे हैं, तब भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन‑रूसी विकेन्द्रीकरण का समर्थन कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है? इस पर विपक्षियों ने कहा, ‘नीति में दोहरे मानक न केवल अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को भी जोखिम में डालते हैं’।
परिणामस्वरूप, अब यह देखना बाकी है कि भारत की सरकार इस नई वैश्विक ऊर्जा तूफ़ान से कैसे निपटेगी। क्या वह रणनीतिक टैंकरों की पुनःपूर्ति, वैकल्पिक ईंधन के प्रोत्साहन और मूलभूत मूल्य नियंत्रण के मिश्रण से स्थिरता लौटाने में सक्षम होगी? या फिर ‘बाजार‑नियंत्रण के आश्वासन’ और ‘विलंबित ऊर्जा सुधार’ के बीच फँसेगी? इस प्रश्न का उत्तर न केवल सरकार की वैधता पर, बल्कि भारतीय जनजीवन की बुनियादी सुरक्षा पर भी निर्भर करता है।
Published: May 3, 2026