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Category: राजनीति

यूक्रेन के ड्रोन ने रशिया के बाल्टिक बंदरगाह को मारपीट; भारत की विदेश नीति पर उठता सवाल

कर्ज़ी-रुसिया के बीच तनाव की सीमाएँ फिर एक बार बदलती दिखी हैं। यूक्रेन के सशस्त्र बलों ने इस रविवार रूस के बाल्टिक पोर्ट को लक्षित किया, जहाँ ड्रोन से किए गए प्रहार ने टैंकरों और बंदरगाह सुविधाओं को नुकसान पहुँचाया। यूक्रेनी राष्ट्रपति वॉलेडीमिक ज़ेलेंस्की ने कहा कि दो ‘शैडो फ़्लीट’ टैंकर्स भी नवरोस्सीysk के पास किए गए हमले में टैक्सी के निशाने पर आए।

आर्थिक और ऊर्जा‑सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह घटना भारत में घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। भारत के कई प्रमुख तेल कंपनियों की रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति पर अभी भी भारी निर्भरता बनी हुई है, और इस प्रकार की सैन्य‑हाई‑स्टेक्स घटना भारत के टॉप‑डीलर को पुनः‑समीक्षा करने पर मजबूर कर सकती है। बावजूद इसके, नई दिल्ली की विदेश नीति ने अब तक इस संघर्ष में स्पष्ट‑बोल वाला पक्ष लेना टालते हुए ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का आत्म‑व्रण जारी रखा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत ‘शांति‑प्रक्रिया’ की वकालत करता रहेगा और ‘सभी‑पक्षीय संवाद’ को प्रोत्साहित करेगा। यह बयान, जैसा कि कई राजनीतिक विश्लेषकों ने नोट किया, ‘विचारधारा‑मुक्त’ शब्दावली के साथ वास्तव में पाकिस्तान‑उत्पीड़न वाले कूटनीतिक चक्र में फँसा हुआ दिखता है। विपक्षी कांग्रेस ने इस समय का फायदा उठाते हुए सरकार पर ‘आर्थिक स्वार्थ’ का आरोप लगाया, कहती है कि रूसी ऊर्जा के साथ नज़दीकी संबंध भारत को अंतरराष्ट्रीय नीतियों के ‘भारी‑पैमाने’ के तनाव में धकेल रहा है।

पर्यवेक्षक कहते हैं कि भारत का ‘गैर‑सम्प्रदायिक’ ठहराव अब ‘पारदर्शिता‑हीन’ निर्णय बनाने की ओर तिरछा है। बुधवार को संसद में उठे प्रश्न में कई विधायक यह पूछते रहे कि अगर रूसी बुनियादी ढाँचे को सीधे लक्ष्य बनाते हुए यूक्रेन के ड्रोन द्वारा किए गए हमले का समर्थन किया गया तो भारत के अपनी रणनीतिक आत्मनिर्भरता के सिद्धांत कितनी हद तक परीक्षा‑में आएँगे। प्रस्तुत उत्तर में विदेश मंत्री ने कहा कि भारत किसी भी पक्ष को सैन्य‑सामग्री नहीं दे रहा है और ‘सर्वोत्तम समाधान’ कूटनीति के माध्यम से निकाला जाएगा।

सैन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि यूक्रेन की ड्रोन क्षमताएँ अब केवल युक्तियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बड़े‑पैमाने पर शिपिंग‑लाइनों को बाधित करने की रणनीति अपना रही हैं। द्वीप‑राष्ट्रों और खुले समुद्रों पर निर्भर भारत के लिए यह संकेत करता है कि समुद्री सुरक्षा के बड़े‑खतरे को पहचानते हुए अपनी नौसैनिक तैनाती को पुनः‑परिचित करने की जरूरत है—एक बात जो सरकार की मौजूदा ‘मुक्त‑आकाश’ नीति से टकरा सकती है।

जैसे ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस घटना पर प्रतिक्रियाएं दे रहा है, भारत को इस सवाल का जवाब देना होगा: क्या ‘भौगोलिक संतुलन’ के नाम पर मौजूदा कूटनीति‑परिप्रेक्ष्य वास्तव में राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है, या यह केवल ‘इक्लिप्स’ के पीछे छुपा एक ‘राजनीतिक आराम’ बन चुका है? इस संकट के बाद, भारतीय नीति‑निर्माताओं से अपेक्षा है कि वे न केवल ऊर्जा‑सुरक्षा, बल्कि ‘सुरक्षा‑परिदृश्य’ के व्यापक स्वरूप को सामरिक‑सततता के साथ पुनः‑परिभाषित करें।

Published: May 3, 2026