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Category: राजनीति

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युके में लागू होगा ‘ट्रॉमा ट्रैकर’, भारत की पुलिस नीति पर नई चर्चा

इंग्लैंड और वेल्स की पुलिस बलों को अब अपने कर्मचारियों के मनोवैज्ञानिक बोझ को आधिकारिक तौर पर दर्ज करने के लिए ‘ट्रॉमा ट्रैकर’ उपकरण अपनाने के निर्देश मिले हैं। गृह विभाग द्वारा जनवरी में प्रकाशित श्वेतपत्र में 43 पुलिस बलों में यह प्रणाली अनिवार्य करने की विधायी दिशा निर्धारित की गई है, जिससे अधिकारी‑कर्मचारियों को मौत, हिंसा, दुर्व्यवहार और उपेक्षा के लगातार झटकों के प्रभावों का संकलन करना पड़ेगा।

भारत में इस कदम का प्रतिध्वनि पहले से ही सुनाई दे रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कई बार पुलिस में मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की बात कही है, परन्तु ठोस कदम अक्सर महंगे प्रशिक्षण या आश्रमों के नाम पर ही सीमित रहे हैं। युके‑मॉडल का उल्लेख करते हुए विपक्षी प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया है कि क्या भारत में भी समान प्रणाली को लागू करने से राज्य‑स्तर पर पुलिस बोर्डों के बीureaucratic कब्जे में कमी आएगी, या फिर यह केवल एक औपचारिक ‘काग़ज़ी उपाय’ बनकर रह जाएगा।

‘ट्रॉमा ट्रैकर’ का लक्ष्य है कि प्रत्येक अधिकारी की व्यक्तिगत फ़ाइल में निरंतर तनाव‑स्तर, घटना‑की‑विवरण और उपचार‑अनुरोधों का रिकॉर्ड रखकर सामूहिक रूप से सहायता संरचनाओं को सुदृढ़ किया जा सके। जबकि इस पहल की प्रशंसा उन समूहों ने की है जो पुलिस के मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा करने को ‘सिस्टमिक लापरवाही’ के रूप में देखते हैं, वहीं कुछ पुलिस यूनियनों ने इसे ‘डेटा‑भरण का अतिरिक्त बोझ’ कहा है, जिसका आरोप है कि यह मौजूदा कार्यभार को और बढ़ा देगा।

न्यायिक निगरानी और गोपनीयता की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। अनुमोदित रिपोर्ट के अनुसार, डेटा को राष्ट्रीय स्तर पर एक केंद्रीकृत पोर्टल में संकलित किया जाएगा, जिसमें निजी‑सार्वजनिक साझेदारी के माध्यम से विश्लेषण और हस्तक्षेप की योजना बनायी़ जाएगी। आलोचकों का तर्क है कि बिना स्पष्ट प्रोटोकॉल के व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक जानकारी का केंद्रीकृत संग्रह संभावित दुरुपयोग और स्टिग्मा का कारण बन सकता है।

वित्तीय पहलू को भी अनदेखा नहीं किया गया है। अनुमानित लागत के अनुसार, लागू करने वाले प्रत्येक पुलिस बल को नई सॉफ़्टवेयर, प्रशिक्षण और तकनीकी समर्थन पर वार्षिक रूप से लगभग दो करोड़ रुपये (लगभग पाँच लाख पाउंड) खर्च करने की जरूरत होगी। इस खर्च को अभी तक संसद में बजट अधिनियम में स्पष्ट नहीं किया गया है, जिससे सड़कों पर कार्यरत पुलिस की सबसे तत्काल जरूरत—अधिक कार्मिक एवं आधुनिक उपकरण—पर धन आवंटन के विकल्प पर बहस उत्पन्न हो रही है।

भारत में इस परिप्रेक्ष्य में कई राज्य सरकारें अपनी पुलिस‑साधन नीतियों का पुनर्मूल्यांकन कर रही हैं। राष्ट्रीय नीति आयोग ने हाल ही में ‘पुलिस मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य’ पर एक कार्यशाला आयोजित की, जिसमें युके‑मॉडल को एक ‘संदर्भ बिंदु’ के रूप में पेश किया गया। हालांकि, कई विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि दो अलग-अलग सामाजिक‑सांस्कृतिक ढांचों में समान टूल लागू करने के लिए अनुकूलन की आवश्यकता होगी; युके में सामना होने वाले जोखिम—जनसंख्या घनीभूत शहरी इलाकों में आतंकवादी हमले—भारत के ग्रामीण‑शहरी मिश्रित परिदृश्य से काफी भिन्न हैं।

सारांशतः, ‘ट्रॉमा ट्रैकर’ का युके में अनिवार्य आदेश एक महत्वपूर्ण नीति प्रयोग के रूप में सामने आया है, जो न केवल पुलिस बलों के भीतर मानसिक‑स्वास्थ्य समर्थन के सतह को उन्नत करता है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की नई माँग भी करता है। भारत में इसके प्रतिध्वनि ने आधिकारिक संवाद को तेज कर दिया है, परन्तु इसे वास्तविक कार्यवाही में बदलने के लिए स्पष्ट बजट, डेटा‑सुरक्षा, और राज्य‑केंद्रीय समन्वय जैसी बुनियादी चुनौतियों को हल करना होगा। नहीं तो यह और भी एक ‘राजनीतिक संकेत’ बन कर रह जाएगा, जिसका लब नहीं, काम नहीं।

Published: May 7, 2026