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Category: राजनीति

यूएई में ईरान से क्षेपणास्त्र‑ड्रोन हमला, भारत की मध्य‑पूर्व नीति पर सवाल उठे

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 4 मई को ईरान से लॉन्च किए गए क्षेपणास्त्र और ड्रोन के संभावित हमले की सूचना दी। इस विकास ने भारत की मध्य‑पूर्व में चल रही दोधारी कूटनीतिक नीति को फिर से परखने पर मजबूर कर दिया। ऊर्जा आयात, ग़ुरदुबंद भारतीय प्रवासी समुदाय और राष्ट्रीय सुरक्षा के कई आयाम अब खुद को एक जटिल ताना‑बाना में पाएँगे।

नई दिल्ली में, विदेश मंत्रालय ने तुरंत एक बयान जारी कर कहा कि वह स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहा है और “सभी पक्षों से शांति‑भरे संवाद की अपील” की है। इस तरह के सामान्य बयानों के साथ, सरकार ने अभी तक किसी ठोस कूटनीतिक कदम, जैसे इज़रान‑ईरान तनाव में मध्यस्थता करने या यूएई के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने का संकेत नहीं दिया। आलोचक कह रहे हैं कि यह “सुरक्षा‑विलंबित” प्रतिक्रिया, सत्तारूढ़ गठबंधन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर धोखा‑ख़ज़ाने के जोखिम में डाल रही है।

विपक्षी दलों ने इस अवसर का पूरी तरह उपयोग कर सरकार के विदेश नीति के “विलंब” पर सवाल उठाए। कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने कहा कि “भारत ने जब से द्विपक्षीय ऊर्जा समझौतों को प्राथमिकता दी है, तब से मध्य‑पूर्व में अस्थिरता के प्रति सतर्कता को नहीं बदला।” उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष को राष्ट्रपति के “नीति‑बाज” कहकर उपहासा किया, तथा जल्द ही संसद में एक विशेष प्रश्नविचार सत्र का आह्वान किया, जिसमें विदेश मंत्री को इस घटना के पीछे की रणनीति स्पष्ट करने को कहा गया।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई, जो भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता है, पर इस तरह के संभावित हमले की संभावना, भारत को अपने समुद्री सुरक्षा तंत्र को पुनःसमीक्षित करने पर मजबूर कर सकती है। इस बीच, भारतीय नौसेना ने पहले ही पश्चिमी अटलांटा के पास कार्यरत पनडुब्बी को “सतर्क” अवस्था में रहने की सूचना दी। लेकिन सरकार ने इस कदम को सार्वजनिक तौर पर नहीं जोड़ा, जिससे जनता में “छुपी हुई तैयारी” के बारे में असमंजस और संशय बना रहता है।

साथ ही, इस प्रकार की सीमा‑परिचालन घटनाएँ भारतीय प्रवासी समुदाय पर भी आघात करती हैं। यूएई में करोड़ों रुपये के वार्षिक योगदान वाले भारतीय कर्मचारियों को इस तनाव से लेकर नौकरी‑भुक्तान और वीज़ा नवीनीकरण में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। विपक्ष ने इस पहलू को “आधारभूत सुरक्षा की असहायता” कहा और विदेश मंत्रालय से “जनसमुदाय‑सुरक्षा” की स्पष्ट योजना माँगी।

नीति‑परिणाम पर विचार करने पर, कई आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि इस प्रकार की अस्थिरता भारत के तेल आयात पर सीधे प्रभाव डाल सकती है, जिससे घरेलू सब्सिडी और महंगाई पर दबाव बढ़ेगा। इससे आगामी राज्य चुनावों में भी विपक्षी पार्टियों को लाभ हो सकता है, जिन्होंने सरकार के ‘ऊर्जा स्वतंत्रता’ के वादे को “केवल वाक्यांश” कहकर खारिज किया है।

आगे देखते हुए, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत को दो ध्रुवों – ईरान के प्रॉक्सी‑समूहीकरण और यूएई‑संयुक्त राज्य के रणनीतिक गठबंधन – के बीच संतुलन बनाना होगा। जबकि नई दिल्ली लगातार “रक्षा‑सहयोग” का उल्लेख करती है, वास्तविक में वह परस्पर विरोधी प्रतिबद्धताओं के बीच झूलती दिख रही है। उत्तरी अरब में इस तरह की अस्थिरता के साथ, भारत की विदेश नीति के दायित्व, जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं, और यह सवाल कि क्या सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को सही दिशा में ले जा रही है, अब सार्वजनिक विमर्श का प्रमुख बिंदु बन चुका है।

Published: May 4, 2026