मनिपुर में तीन साल में बढ़ती हिंसा: अनजान हत्यारों की अनसुलझी कहानी
2023 के अंत में मेती और कुँकी समुदायों के बीच विस्फोटक टकराव के बाद से, दूरस्थ उत्तर‑पूर्वी राज्य मनिपुर का सामाजिक परिदृश्य लगातार बदलता और गहरा होता जा रहा है। तीन साल बाद भी कई मामलों में "अज्ञात" हत्यारों का नाम नहीं ले पाते, जिससे मृतकों के रिश्तेदारों के साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं की भरोसेमंदता पर गहरा सवाल खड़ा होता है।
केंद्रीय सरकार ने पहले ही इस क्षेत्र में आर्टिकल 37 (संदेहास्पद) के तहत भारतीय सशस्त्र बलों (AFSPA) को लागू किया, लेकिन सुरक्षा बलों की उपस्थिति ने असहाय जनता को संरक्षण देने के बजाय कई बार "परिचालन‑खामियों" का परिचय दिया। जमीनी स्तर पर मिल रहे दस्तावेज़ और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में बताया गया है कि कई गोलीबारी घटनाओं में न तो स्थानीय पुलिस nor केंद्रीय बल जिम्मेदारी ले रहे हैं, न ही पहचान‑परिचय वाला कोई नाम सार्वजनिक किया गया।
मुख्य-बिंदु यह हैं कि:
- पिछले तीन वर्षों में 2,800 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं, और उनका अधिकांश हिस्सा अभी भी अननाम हत्यारों की लकीरों में अनसुलझा है।
- मनिपुर के मुख्यमंत्री न. बीरेन सिंह ने बार‑बार कहा कि सरकार "आतंक के धुंधले साये" से लड़ रही है, परन्तु स्वतंत्र जांच आयोग की नियुक्ति अभी तक नहीं हुई।
- विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और नव उभरे एएपी, सरकार पर "राजनीतिक असहिष्णुता" और "कुशली‑जन्य हिंसा" को रोकने में लापरवाह रहने के आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने एक संयुक्त प्रार्थना पत्र में कहा कि अगर संघीय असहायता को समाप्त नहीं किया गया, तो आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों में सत्ता का संतुलन बदल सकता है।
नीति‑स्तर पर कई पहलें घोषित की गईं: पुनर्वास पैकेज, आर्थिक प्रोत्साहन, तथा बहु‑सामुदायिक संवाद मंच। परंतु इन योजनाओं का कार्यान्वयन अक्सर “ध्यान‑भटकाव” की तरह प्रतीत होता है; कई पुनर्वास शरणार्थियों ने बताया कि उनके घर फिर से बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, जबकि सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा कि "विकास‑पथ पर बाधाएँ केवल अस्थायी हैं"।
सार्वजनिक हित की दृष्टि से इस निरंतर अंधाधुंध हिंसा के दो प्रमुख प्रभाव सामने हैं। प्रथम, आर्थिक विकास में ठहराव—पर्यटन, कृषि और छोटे उद्योगों का ठेस, जिससे रोजगार के अवसर घटे। द्वितीय, सामाजिक विखंडन—भेदभाव और प्रतिशोध की भावना पीढ़ियों तक बँध रही है, जिससे लोकतांत्रिक संवाद का स्थान घट रहा है।
जबकि केंद्र सरकार ने कहा है कि "शांति के दीर्घकालिक समाधान" के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) में विशेष सत्र आयोजित किया जाएगा, विपक्ष ने इसे "नीति‑विफलता को छुपाने की चेष्टा" कहा। कई नागरिक अधिकार संगठनों ने अंतरिम न्यायालय में अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की मांग की है, परन्तु अभी तक कोई वास्तविक कार्रवाई नहीं हुई।
यदि सरकार इस सामुदायिक संघर्ष को केवल सुरक्षा‑केंद्रित उपायों से हल करने का प्रयास जारी रखती है, तो मनिपुर में शांति‑संधि का सपना केवल कागज़ी बयानी बन कर रह जाएगा। राजनीतिक जवाबदेही, निष्पक्ष जांच और जबरन विस्थापित लोगों की वास्तविक पुनर्स्थापना ही इस अज्ञात हिंसा को समाप्त करने की एकमात्र आशा हो सकती है।
Published: May 6, 2026