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Category: राजनीति

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मतदान केंद्र खोलने से पहले की तैयारियाँ: वोटर सूची से लेकर सुरक्षा तक

देश भर में मतदान स्थल पर नागरिकों का झुंड निर्भीकता से जमा हो रहा है, लेकिन द्वार खुले से ठीक पहले क्या होता है, यह अक्सर जनता की नज़र से दूर रहता है। इस चरण में चुनाव प्रबंधन की बारीकियों को समझना, लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्वस्थता को आंकना और प्रशासनिक जवाबदेही का आकलन करना अनिवार्य बन जाता है।

इंडियन इलेक्शन कमिशन (ईसीआई) हर एक पोलिंग स्टेशन को 7 बजे खुलने से पूर्व कई चरणों का अनिवार्य पालन करवाता है। सबसे पहले, वोटर सूची की सत्यता जाँच की जाती है। स्थानीय अधिकारी (जिल्हा स्तर पर) एलीडेबल वोटर लिस्ट (EVL) को दो बार जाँचते हैं, ताकि दोहराव, गायब या फर्जी नामों को हटाया जा सके। इस प्रक्रिया में अक्सर पिछले चुनावों की शिकायतें—जैसे कि कुछ खास गामों में वोटर नामों का हट जाना या अतिरिक्त नामों का जोड़ना—उथल-पुथल मचा देते हैं, जिसके कारण विपक्षी दल इस चरण को ‘बहुपक्षी छंटनी’ का आरोप लगाते हैं।

EVM और VVPAT मशीनों की सेट‑अप अगला मुख्य कदम है। ईसीआई ने 2025 में सभी 1.52 करोड़ मतदान केंद्रों में ‘ऑटॉमेटेड इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ (EVM) के साथ ‘विजिबल वोटर पेपर ऑडिट ट्रेल’ (VVPAT) को अनिवार्य बना दिया था। तकनीकी टीमें प्रत्येक मशीन को शिफ्ट‑टेस्ट, बैटरी‑टेस्ट और सॉफ्टवेयर वर्ज़न‑चेक से गुजारती हैं। किसी भी अनुचित कार्य या दोषपूर्ण मशीन को तुरंत ‘डिफेक्टिव’ घोषित कर, बैक‑अप सेट के साथ बदल दिया जाता है।

सुरक्षा व्यवस्था भी इस समय चरम पर पहुँचती है। चुनाव अवधि में 1.5 लाख पुलिस बल, 75,000 केन्द्रीय सुरक्षा कर्मी और 3,00,000 मिलिशिया वॉलंटियर्स को ‘आर्टिकुलेटेड’ (अर्थात, सख्त) कस्टडी में रखा जाता है। विभिन्न राज्यों ने विशेष ‘सुरक्षा परिपत्र’ जारी किया है, जिसमें ‘रिवर्स इंटेलिजेंस’, ‘ड्रोन‑सहायता’, और ‘साइबर मॉनिटरिंग’ जैसी आधुनिक तकनीकें शामिल हैं। फिर भी, विरोधी दल और नागरिक समाज अक्सर इस बात पर सवाल उठाते हैं कि ‘भारी सुरक्षा’ से मतदाता भ्रमित या डर के कारण मतदान से दूर नहीं होते।

राजनीतिक दलों की भी इस समय तेज़ गति से अभियान चल रहा है। जनता के समूहों को ‘आखिरी बार’ घर‑घर जाकर ‘मोटरवेज़’ और ‘ट्रायथलॉन’ के माध्यम से मतदाता प्रेरित करने की कोशिश करते हैं। वहीं, कई बार ‘वोट‑ब्याय’ और ‘रैली‑ड्रॉप’ जैसी अनधीकृत रणनीतियों के आरोप भी उठते हैं; इन मामलों में पुलिस को ‘आधिकारियों से बचाव’ के आह्वान के साथ जाँच शुरू करनी पड़ती है। गठबंधन के गणितीय फ़ायदे या प्रतिद्वंद्वियों की कमजोरियों को आंकते हुए, रणनीतिक नेता ‘बंद दरवाज़े’ में ही कई बार ‘स्थानीय स्तर के प्रभावित सन्देश’ तैयार कर देते हैं।

इन सभी तैयारियों के बावजूद, कुछ ठोस समस्याएँ लगातार सामने आती हैं। पिछले दो चुनावों में, कई रिपोर्टों में बताया गया कि कांग्रेसियों का ‘वोटर लिस्ट में वृद्धि’ और ‘EVM में अनजानेगा बकाया’ समस्याएँ सतत बनी रहीं। इसके अलावा, छोटे शहरों में ‘भू‑प्रशासनिक अनियमितताएँ’—जैसे कि polling station की गलत जगह पर तयान—वोटर तक पहुँचने में बाधा बनती हैं। इन मुद्दों पर ईसीआई ने कहा है कि ‘स्थानीय चुनाव अधिकारी इस त्रुटि को महसूस होने पर तुरंत सुधार करेंगे’, पर आलोचक तर्क देते हैं कि इसे ‘स्वयं-नियंत्रण’ की सीमाओं में बंद करके जवाबदेही से बचा जा रहा है।

इस जटिल परिप्रेक्ष्य में, सार्वजनिक हित का सवाल प्रमुख बनता है। जब मतदान केंद्र खोलने से ठीक पहले की प्रक्रिया बेतरतीब ढंग से ‘भ्रष्टाचार’ या ‘कुशलता’ के दो ध्रुवों के बीच टकराती है, तो लोकतंत्र की रीढ़—आधिकारिक प्रक्रिया—में दरारें पैदा हो सकती हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि प्रत्येक चरण का ‘पारदर्शी ऑडिट’ किया जाए, नागरिक समाज को ‘रियल‑टाइम मॉनिटरिंग’ का अधिकार दिया जाये, और किसी भी तरह के ‘अधिनियमित दुरुपयोग’ पर कड़ी सजा दी जाये।

समाज, मीडिया और राजनीतिक वर्ग को मिलकर यह देखना होगा कि ‘द्वार खुलते ही मतदान शुरू हो’ नहीं, बल्कि ‘पहले दरवाज़े के पीछे की तैयारी भी लोकतंत्र की शान में योगदान दे’। तभी भारत में चुनाव प्रक्रिया न केवल मतदान के आँकड़े में, बल्कि सार्वजनिक विश्वास में भी सफलता पायेगी।

Published: May 7, 2026