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माली में अल‑कायदा‑सम्बन्धी प्रतिरोधियों ने फूड ट्रक जलाए, भारत की सीमा‑सुरक्षा नीति पर प्रश्न उठे
माली की राजधानी बामाको के निकट कई सड़कों को अल‑कायदा के साथ जुड़े सशस्त्र समूहों ने लगातार निलंबित कर रखा है। इस कदम के हिस्से के तौर पर उन्होंने सड़क किनारे लगे खाद्य ट्रकों को आग सौंप दी, जिससे स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला में धक्का लगा और नागरिक जनजीवन बाधित हुआ। घटनाक्रम से पता चलता है कि सैन्य दबाव के बावजूद दहशतवादियों ने खुद को फिर से तैनात कर रखा है।
जबकि यह घटना अफ्रीकी महाद्वीप के भीतर सुरक्षा अस्थिरता को दर्शाती है, भारत के राजनैतिक संदर्भ में यह एक ताज़ा संकेत बनती है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सरकार ने ‘सशक्त सीमा सुरक्षा’ और ‘जटिल आतंकवादी नेटवर्क को जड़ से खत्म करने’ का दावा किया है, परन्तु पड़ोसी देशों में इसी तरह के हमलों की बढ़ती आवृत्ति इस दावे को धुंधला कर रही है।
विपक्षी दलों का तर्क है कि विदेश नीति की झुंकी ‘डिज़ीटल डिप्लोमेसी’ और ‘साइबर‑सुरक्षा’ पर ज्यादा केंद्रित है, जबकि जमीनी स्तर पर सशस्त्र विद्रोहियों के संचालन को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। संसद में कई सदस्यों ने पूछताछ की कि भारत की सीमाओं के निकट स्थित अफ्रीकी देशों में निरंतर आतंकवादी गतिविधियों को देखते हुए, हमारे पास कोई ठोस एनालिटिक्स या साझा निगरानी मंच है या नहीं।
सुरक्षा मंत्रालय ने कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूती देने के लिए ‘आफ़्रिकियन सुरक्षा मंच’ में सक्रिय भागीदारी की है, परन्तु इस बयान में कई खामियां नजर आती हैं। उपयुक्त सामरिक सहयोग के बिना, अल‑कायदा के इस तरह के स्थानीय गठजोड़ों को रोकना केवल कागज़ी प्रतिबद्धता तक सीमित रह सकता है।
तकनीकी रूप से, भारतीय सशस्त्र बलों का ‘इंडियन‑अफ़्रीका डिफेंस लिंकेज’ प्रोजेक्ट कई सालों से चल रहा है, परन्तु इस परियोजना की वास्तविक डिलिवरी और फील्ड स्तर पर प्रभाव अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। आलोचक कहते हैं कि परियोजना का आर्थिक पहलू अधिक चमक दिखाता है, जबकि सुरक्षा‑इंटेलिजेंस की बुनियादी जरूरतों को संबोधित नहीं करता।
जनता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बामाको में फूड ट्रकों की जलन ने स्थानीय लोगों को भूख की कगार पर खड़ा कर दिया। इसी तरह, भारत के भीतर सीमापार व्यापार और प्रवासी कार्यकर्ता भी इस प्रकार के आतंकवादी विस्तार से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। इसलिए, यह मामला सिर्फ एक विदेशी साहसिक नहीं, बल्कि हमारे अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के जोखिम को उजागर करने वाला एक चेतावनी स्वर है।
जैसे ही सरकार ‘विकास‑रक्षा दोहरी नीति’ का हवाला देती है, विपक्ष यह सवाल उठाता है कि क्या यह दोहरी नीति वास्तविक में दो अलग-अलग प्राथमिकताओं को संतुलित कर रही है या फिर किसी एक को ही बल दिया जा रहा है। इस दुविधा का समाधान तभी संभव है जब पारदर्शी जवाबदेही, नीति‑निर्धारण में बहु‑पक्षीय इनपुट और स्थानीय स्तर पर त्वरित कार्रवाई को प्राथमिकता दी जाए।
Published: May 7, 2026