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Category: राजनीति

माली के सैन्य शासन पर गठबंधन रेज़िस्तान का दबाव, सत्ता में दरारें

पिछले दो दशकों में कई अफ्रीकी देशों में छेड़छाड़ की योजना से कामयाब हुए सैन्य शासन, अब माली में गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। असिमि गोइटा के नेतृत्व में चल रहे मिलिसिया सरकार को एकत्रित सशस्त्र समूहों और दंगा‑बाजों का गठबंधन, जो पूर्वी और मध्य प्रांतों में सक्रिय है, परख रहा है कि सत्ता का दुरुपयोग कितनी जल्दी टूट सकता है।

हथियारबंद गठबंधन में अल‑कायद़ा से जुड़े कम्युनिटीज़, तुहारादी तुर्ही समूह, तथा क्षेत्रीय बंडियों का मिलन है। उनका लक्ष्य केवल सैन्य सरकार का वैधता को क्षीण करना नहीं, बल्कि बहु‑स्तरिया असंतोष को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाना है। इस प्रकार, एक ओर जहां माली की सत्ता की बुनियादें कंपकंपा रही हैं, वहीँ दूसरी ओर स्थिति की जटिलता भारतीय राजनीति के समान एक शतरंज खेल बन गई है—जहाँ सत्ता (सत्ता) और विपक्ष (विरोधी समूह) दोनों ही रणनीतिक चालें चलता है।

भारत में जब कोई केंद्रिय सरकार को सशस्त्र विरोधी समूह या कट्टर राजनैतिक दल चुनौती देता है, तो चुनावी दावों और नीति‑विफलता का सवाल उठता है। माली में भी यही परिदृश्य दोहराया गया है। जमीनी स्तर पर असुरक्षा, आर्थिक अवसरों की कमी और बेसहारा युवाओं की निराशा, सभी को मिलिसिया सरकार के “स्थिरता” के निरंतर दावों को वैधता पर सवाल उठाते हुए दिखाया गया है।

आधिकारिक नीति‑दिशा‑निर्देशों में “रिपब्लिक को सुदृढ़ करना” और “अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को सुदृढ़ करना” है, परन्तु वास्तविकता में सुरक्षा संचालन की असफलता, मानव अधिकार उल्लंघन की रिपोर्टें और निरंतर मानवीय संकट, इन दावों को खाली शब्दों की पिठारी में बदल देती है। जैसे भारतीय संसद में नीति‑नीतियों को लागू करने में अक्सर “जॉब्स की कमी” को जिम्मेदार ठहराया जाता है, वैसे ही यहाँ “सुरक्षा की कमी” को गठबंधन की सफलता का प्रमुख कारण कहा जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई देशों ने माली की सैन्य सरकार को लोकतांत्रिक निरंतरता की दिशा में “प्रस्थापित” करने को कहा। ECOWAS, संयुक्त राष्ट्र और फ्रांस की नीतियों में स्पष्ट रूप से “सिविलियन सरकार की वापसी” का आह्वान है, परन्तु इस प्रकार की बाहरी दबाव की प्रभावशीलता भी भारत में अक्सर देखी जाने वाली “विदेशी हस्तक्षेप” की बहस की तरह तर्क-सम्पन्न बनी रहती है।

प्रशासनिक जवाबदेही के सवाल भी बढ़ते ही दिख रहे हैं। सुरक्षा बलों की दीर्घकालीन संचालन लागत, स्थानीय जनसंख्या के साथ विश्वास की हानि और असंगत नीति‑कार्यान्वयन, सभी मिलकर सरकार की “अधिकार” को कमजोर कर रहे हैं। इस स्थिति में, यदि कोई राष्ट्रीय मंच पर “विपक्ष” को वैध मान्यता दी जाए, तो माली की सशस्त्र सरकार को अपने अस्तित्व की पुनः पुष्टि करनी होगी—जैसे भारतीय विपक्ष को चुनावी मंच पर पुनः स्थापित होना पड़ता है।

सारांश में, माली की सैन्य सरकार का नियंत्रण धीरे‑धीरे बहस से बाहर नहीं रहता; वह गठबंधन के बढ़ते दबाव, नीति‑विफलता, और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की कमी से चुनौती‑भरा माहौल बनाता जा रहा है। यह प्रक्रिया न केवल स्थानीय जनता के जीवन‑स्तर को प्रभावित करेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे में भी नई बारीकी के साथ बदलाव के संकेत देगी।

Published: May 4, 2026