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Category: राजनीति

मीथेन उत्सर्जन नियंत्रण को ऊर्जा सुरक्षा का समाधान कहा, सरकार के वादों पर सवाल

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपने नवीनतम रिपोर्ट में कहा कि मीथेन उत्सर्जन को काबू में लाने से जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के साथ‑साथ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा भी सुदृढ़ होगी। इस दिशा‑निर्देश को भारत में सरकार ने ‘ऊर्जा आत्मनिर्भरता’ के धागे में पिरोने की कोशिश की, पर वास्तविकता में कई लापरवाही और नीति‑असफलता छिपी हैं।

रिपोर्ट में इशारा किया गया कि ईरान के संकट से उत्पन्न तेल‑आपूर्ति के व्यवधानों को मीथेन को कम करके संतुलित किया जा सकता है। यह तर्क भारत के निर्यात‑निर्भर ऊर्जा नीति के विपरीत है, जहाँ आयातित गैलन‑कच्चे तेल पर भारी निर्भरता है। सरकार ने कहा कि मीथेन को कम करने से गैस‑आधारित बिजली उत्पादन अधिक टिकाऊ बनेगा, परंतु देश में गैस क्षेत्र के पारदर्शी डेटा एवं निगरानी तंत्र अभी भी अधूरा है।

विपक्ष ने इस बात को चिह्नित किया कि केंद्र ने ‘राष्ट्रीय मीथेन एन्ड्रिक्शन मिशन’ का नाम तो रखा, पर निगरानी‑सुधार, उल्लंघनों पर सजा और सार्वजनिक रिपोर्टिंग के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनाई। कई राज्य विधानसभा में यह मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस, सपा और भाजपा के विरोधी दलों ने कहा कि सरकार जलवायु संकल्पों को दिखावटी बनाकर विदेशी संस्थाओं के सामने प्रदर्शन कर रही है, जबकि असली सफाई कार्यस्थलों पर नहीं हो रहा।

गैर‑सरकारी संगठनों ने भी चेतावनी दी कि मीथेन का औसत उत्सर्जन भारत के तेल‑गैस क्षेत्रों में, विशेषकर ओडिशा, महाराष्ट्र और गुजरात के शिल्पकटावों में, सही समय पर नहीं पकड़ा जा रहा। उन्होंने कहा, “मेथेन के छोटे‑छोटे रिसाव एकत्रित होकर जलवायु परिवर्तन को तेज़ कर देते हैं, और इसके साथ‑साथ गृहस्थी में इनकी कीमत बढ़ती है।” यह बात सरकारी आंकड़ों के विपरीत है, जहाँ ऊर्जा मूल्य को स्थिर रखने का दावा किया जा रहा है।

वैश्विक ऊर्जा संकट के संदर्भ में, मीथेन को घटाने के लिए तकनीकी उपाय जैसे गैस‑लीकेज डिटेक्शन, इमरजेंसी शट‑डाउन सिस्टम और नवीकरणीय ऊर्जा का तेज़ी से प्रसार आवश्यक है। लेकिन भारत में खनन लाइसेंसों को तेज़ी से मंजूरी देना, तथा पेट्रोलियम क्षेत्र में विदेशी निवेश को आकर्षित करना प्राथमिकता बनी हुई है। इस संदर्भ में सवाल उठता है कि क्या सरकार वास्तव में जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्राथमिकता देती है या ऊर्जा सुरक्षा के बहाने मौजूदा फॉसिल‑फ़्यूल संरचनाओं को स्थिर रख रही है।

जैसे ही देश में आगामी राज्य चुनावों की भीड़ बढ़ रही है, मीथेन नियंत्रण को ऊर्जा नीति के प्रमुख स्तम्भ के रूप में पेश करना एक राजनीतिक चाल लगती है। चाहे वह ‘ग्रीन इंडिया’ अभियान हो या ‘ऊर्जा आत्मनिर्भरता’ का नारा, वास्तविक जवाबदेहियों को निपटाने के लिए पारदर्शी डेटा, सख़्त नियामक फ्रेमवर्क और सार्वजनिक सहभागिता जरूरी है। नहीं तो मीथेन उत्सर्जन को कम करने की वादा‑भरी घोषणा बस एक और राजनीतिक पोस्टर बनकर रह जाएगी।

Published: May 5, 2026