मोडी की भाजपा ने पहली बार पश्चिम बंगाल जीतकर सत्ता को मजबूत किया
2026 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी भारतीय जनसंघ (भाजपा) ने पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत हासिल की। औपचारिक मतगणना में पार्टी ने 195 में से 182 सीटें सुरक्षित कर लीं, जिससे राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में पहले से अधिक बदलाव आया। यह सफलता केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की दीर्घकालिक रणनीति का परिणाम कहलाती है, जिसका मूल नारा ‘हैगेमोनिक पावर’ था।
भाजपा की जीत के पीछे दो प्रमुख कारक उभरे—धर्मीय ध्रुवीकरण और हटते शासनों का उपयोग। चुनावी अभियान के दौरान कई प्रमुख नेताओं ने हिंदू राष्ट्रवाद को प्रमुख मुद्दा बनाया, विशेष रूप से मुस्लिम-अधारित क्षेत्रों में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने के लिये ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘धर्म की सुरक्षा’ के मुद्दे दोहराए। यह भी उल्लेखनीय है कि कई छोटे‑छोटे ‘हिंदू कल्याण’ मंचों को विशेष लाइटिंग और संसाधनों के साथ झलकाया गया, जबकि विपक्षी दलों को ‘धर्म के दुरुपयोग’ के आरोपों से घेरते दिखाया गया।
एक साथ, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के निरंतर शासक रहने से उत्पन्न सार्वजनिक असंतोष का फायदा उठाया गया। 2021 में टीएमसी को सुभाष चंद्र बोस के शौर्य का बख़्तर बना कर आर्थिक विकास के मंच पर लाया गया था, परन्तु पिछले वर्षों में जल संकट, बेरोजगारी और कर‑आधारित नीतियों पर बढ़ती असंतुष्टि ने ‘हटते शासकों’ की भावना को गहरा किया। भाजपा ने इस विफलता को ‘सरकार का पतन’ जैसा टैगलाइन दिया, जिससे कई मतदाता ‘बदलाव’ के नाम पर अपनी वोट बदलने को तैयार हुए।
केन्द्रीय सरकार ने इस अभियान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नई दिल्ली से पर्याप्त धनराशि, राष्ट्रीय स्तर के रैली और मोदी जी की व्यक्तिगत उपस्थिति ने राज्य‑स्तरीय चुनावी हलचल को ‘परदेशी माहौल' में बदल दिया। विरोधियों का दावा है कि इस प्रकार की भागीदारी भारत के संघीय ढांचे को कमजोर करती है, जहाँ राज्य की स्वायत्तता को राष्ट्रीय पार्टी की रणनीति से माप लिया जाता है।
परिणामस्वरूप, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने इस ‘बाहरी हस्तक्षेप’ को लेकर तीखा तंज़ बदला, जिससे उन्होंने कहा कि ‘पश्चिम बंगाल का लोकतांत्रिक चुनाव अब बाहरी ताकतों के खेल का मैदान बन गया है’। विपक्षी गठबंधन ने कांग्रेस, एएसआरएल और कई स्थानीय दलों को मिलाकर एक संयुक्त रुख अपनाया, परन्तु व्यक्तिगत मतदाताओं को आकर्षित करने में असफल रहा।
भाजपा की जीत से आने वाले नीति‑परिवर्तनों की भी उत्सुकता बढ़ी है। केंद्र सरकार ने पहले से घोषित कई ‘आधारभूत’ योजनाएँ—जैसे कि जल संरक्षण, औद्योगिक इकाइयों की पुनःस्थापना और राष्ट्रीय सुरक्षा के अन्तर्गत ‘विकेन्द्रीकृत’ टेक्नोलॉजी फंड—को राज्य स्तर पर लागू करने का इरादा जताया है। परन्तु मानव अधिकार संगठनों और बहुसांस्कृतिक समाज के विश्लेषक बताते हैं कि यह ‘धर्मीय फ्रेमवर्क’ के साथ जुड़े नीति‑निर्माण से अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर संभावित हानि का जोखिम बना रहता है।
शैक्षिक और सामाजिक समीक्षकों ने इस नतीजे को ‘जियो‑पॉलिटिकल मोड़’ के रूप में देखा है, जहाँ राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति का मिश्रण स्पष्ट रूप से दिखता है। एक ओर जहाँ मोदी सरकार का ‘हैगेमोनिक पावर’ नारा सुदृढ़ हो रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल उठता है कि क्या यह जीत ‘सच्ची जनसंख्या की इच्छा’ है या ‘विचलित मतदाता बहुलता’ के परिणामस्वरूप प्राप्त हुई है।
अंत में, इस जीत का प्रभाव निकट भविष्य में उजागर होगा—पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दिशा-निर्देश, राष्ट्रीय चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन और सामाजिक तनाव की संभावनाएँ सभी इस नए समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी। समय ही बताएगा कि इस ‘सत्ता‑जमाव’ में जनता को किस प्रकार का जवाबदेही मिलती है।
Published: May 4, 2026