भारत के मध्य‑पूर्व नीति पर सवाल: इज़राइल‑लेबनान संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ में बढ़ती तनाव
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2 मार्च से इज़राइल के खिलाफ हुए हवाई हमलों में 2,696 लोग मारे गए हैं। इस मानवीय संकट के बीच, यूएस और ईरान स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ को लेकर तीव्र प्रतिद्वंद्विता में उलझे हुए हैं। दोनों पक्षों के बीच मौखिक धमकियों की लहरें अब वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को भी प्रभावित कर रही हैं। इस अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भारत का रुख और उसका राजनीतिक प्रभाव अधिकाधिक scrutinized हो रहा है।
नई दिल्ली ने आधिकारिक तौर पर अपनी विदेश नीति को ‘संतुलित’ कहकर प्रस्तुत किया है, जिसमें इज़राइल के साथ रक्षा‑सहयोग और लेबनान‑सीरियाई शरणार्थी संकट में सहायता दोन्हों को समान महत्व दिया गया है। लेकिन विपक्षी दल इस संतुलन की वैधता पर कई सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस ने हाल ही में एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि "स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ में बढ़ते तनाव के कारण भारतीय तेल आयात पर संभावित जोखिम है, और सरकार को इस पर वैकल्पिक ऊर्जा रणनीति तैयार करनी चाहिए"।
विपक्ष के प्रमुख नेता, बहुमत-विरोधी गठबंधन के अध्यक्ष, ने संसद में सरकार की विदेश नीति को "द्विध्रुवीय ‘सामंजस्य’ की अंधी धारण" कहा, और मांग की कि विदेश मंत्रालय तुरंत एक विस्तृत जोखिम‑आकलन रिपोर्ट प्रस्तुत करे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मध्य‑पूर्व में निरंतर सैन्य उलटफेर भारत के स्वयं के रक्षा खर्च को बढ़ाएगा, जबकि आंतरिक विकास व शहरी बुनियादी ढाँचे में निवेश कम हो जाएगा।
दूसरी ओर, विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत की मूलभूत रणनीति “ग्लोबल ऊर्जा सुरक्षा” को सुनिश्चित करने के लिए बहुपक्षीय मंचों, जैसे कि G20 और IEA, में सक्रिय भागीदारी है। मंत्रालय ने उपभोक्ता को आश्वस्त किया कि भारत ने अपने तेल आयात स्रोतों को विविध किया है और हॉर्मुज़ में संभावित बंदीकरण से बचने के लिए वैकल्पिक मार्गों पर काम चल रहा है।
परंतु आलोचक इस बात को उजागर कर रहे हैं कि सरकार ने अभी तक किसी स्पष्ट वैकल्पिक रणनीति या आपातकालीन पेट्रोलियम रिज़र्व की घोषणा नहीं की है। इस चूके को लेकर राष्ट्रीय तेल कंपनी और निजी आयातकों दोनों ने असंतोष जताया है, जबकि ऊर्जा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हॉर्मुज़ का बंद होना भारत की दैनिक तेल आयात में 15 % तक की कमी ला सकता है।
भू‑राजनीतिक माहौल में इज़राइल‑लेबनान की लड़ाई, और यूएस‑ईरान के बीच स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ को लेकर तुच्छता का प्रदर्शन, भारत की परराष्ट्र नीति को दो मुख्य चुनौतियों का सामना करवाते हैं: 1) मानवीय मानदण्डों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा एवं आर्थिक हितों का संतुलन, और 2) घरेलू राजनीति में ‘विदेशी नीति’ को चुनावी मुद्दा बनाकर उपयोग करने की प्रवृत्ति।
अंत में, यह स्पष्ट है कि भारत को अब केवल बयान‑बाजी से नहीं, बल्कि ठोस नीति‑परिषदों, आपातकालीन तेल सुरक्षा योजनाओं और पारदर्शी सार्वजनिक संवाद के माध्यम से अपनी विदेश नीति की विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करना होगा। इन कदमों के बिना, अंतर्राष्ट्रीय तनावों का आंतरिक राजनीति पर दुष्प्रभाव बढ़ता रहेगा, और जनता को वह उत्तर नहीं मिल पाएगा जिसकी वह आशा रखती है।
Published: May 5, 2026