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Category: राजनीति

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बदलते आश्रय नियमों पर यूके होम ऑफिस को दो सूडानी शरणार्थियों की कानूनी चुनौती

लॉर्ड शबाना महमूद, गृह सचिव, ने इस हफ़्ते में शरणार्थियों की "लीव टू रिमेन" अवधि को पाँच साल से घटाकर मात्र 30 महीने करने की घोषणा की। यह कदम लेबर सरकार की व्यापक योजना का हिस्सा है, जिसमें शरणार्थियों को स्थायी निवास के लिये 20 वर्ष तक इंतज़ार करना पड़ेगा, जबकि पिछले नियम के तहत पाँच साल में स्थायी रहन-सहन की संभावना थी।

घोषणा के तुरंत बाद दो सूडानी शरणार्थियों ने ब्रिटिश न्यायालय में इस प्रावधान को असंवैधानिक कहा और इसे लागू करने के प्रतिवाद में मुकदमा दायर किया। वे सरकार के "अशरण खरीददार" (asylum shoppers) के आरोपों को खारिज कर, यह तर्क दे रहे हैं कि नई नीति अंतरराष्ट्रीय मानवीय प्रतिबद्धताओं के खिलाफ है और शरणार्थियों के मौलिक अधिकारों को हनन करती है।

संयुक्त राष्ट्र शरण एजेंसी (UNHCR) ने भी इस योजना पर गहरी चिंता जताई है, कहती है कि 30 महीने की सीमित अवधि शरणार्थियों को शोषण के जोखिम में डाल सकती है और यूके की मिलियन‑डॉलर‑फंडेड पुनर्वास प्रतिबद्धता को कमजोर कर सकती है। जबकि लेबर पार्टी ने इसे "आर्थिक बोझ को कम करने" और "संरक्षण प्रणाली को अधिक दक्ष बनाना" के रूप में प्रस्तुत किया है, विपक्षी कंज़रवेटिव्स ने इसको "मानवाधिकारों का उल्लंघन" और "राजनीतिक वोट‑बैंक को आकर्षित करने के लिये दिखावा" कहा है।

आलोचकों का मानना है कि नीति का मूलभूत लक्ष्य अस्थायी प्रवास को स्थायी स्थायित्व में बदलने की दिशा में नहीं है, बल्कि शरणार्थियों को सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क से बाहर धकेलने की कोशिश है। ऐसी परिवर्तनात्मक नीति परन्तु व्यापक सामाजिक लागत लाती है—अस्थिर कानूनी स्थिति से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ेंगी, काम के अवसर सीमित होंगे और सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया बाधित होगी।

सरकार ने कहा है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य अवैध प्रवासन को रोकना और सार्वजनिक संसाधनों पर दबाव कम करना है। लेकिन विरोधी पक्ष के अनुसार, यह तर्क व्यर्थ है जब बजट का एक बड़ा हिस्सा पहले ही शरणार्थी स्वास्थ्य और आवास सहायता पर खर्च हो चुका है। इस बीच, अदालत में चल रही सुनवाई के परिणाम का प्रभाव न केवल दो सूडानी आवेदकों की व्यक्तिगत स्थिति पर होगा, बल्कि यूके में शरण नीति के भविष्य को भी तय कर सकता है।

Published: May 6, 2026