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Category: राजनीति

ब्रिटेन की यूक्रेन ईयू ऋण योजना में भागीदारी: भारत की विदेशनीति के संदर्भ में सवाल

यूरोपियन पोलीटिकल कम्युनिटी (EPC) शिखर सम्मेलन के दौरान, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केयर स्टारमर ने यूरोपीय संघ के 78 अरब पाउंड (लगभग US$100 अरब) के बड़े ऋण पैकेज में शामिल होने की संभावना पर चर्चा करने का इरादा जताया। यह कदम, जो यूक्रेन को आर्थिक समर्थन देने के लिए तैयार किया गया है, अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई सवाल उठाता है, विशेषकर भारत जैसे उभरते महाशक्ति के दृष्टिकोण से।

ब्रिटेन का यह कदम, यूक्रेन के लिए बनी इस अत्यधिक वित्तीय व्यवस्था में शेयरधारक बनने की इच्छा को दर्शाता है। जबकि यूरोपीय संघ ने इस ऋण योजना को “सुरक्षित और पारदर्शी” कहकर पेश किया है, इस दावे की वास्तविकता अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई। वित्तीय अभिकर्ता संस्थाओं की जटिल संरचना, ऋण की पुनर्भुगतान शर्तें और संभावित डिफॉल्ट जोखिम – इन सबका विश्लेषण बिना गहराई से किए नहीं किया जा सकता।

भारत की विदेशनीति इस संदर्भ में दोहरे मानकों से बचने की कोशिश कर रही है। नई दिल्ली ने लगातार कहा है कि वह यूक्रेन-संकट को “राजनयिक समाधान” के माध्यम से सुलझाना चाहता है, जबकि आर्थिक समर्थन के साथ-साथ अपने रक्षा सहयोग को भी सुदृढ़ करने की इच्छा जाहिर की है। लेकिन भारत ने अब तक कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया कि वह ईयू के इस वित्तीय प्रोजेक्ट में भागीदारी को कैसे देखता है। विदेश मंत्रालय की हालिया टिप्पणी में “भूराजनीतिक स्थिरता के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है” कहा गया, पर यह वाक्यांश भारत के अपने मौद्रिक नीति‑निर्णयों में उपयोग किए जाने वाले “आर्थिक स्वार्थ” को नकारता नहीं है।

विपक्षी पार्टियों ने इस स्थिति को “विदेशी ऋण के जाल में फँसने” की आलोचना की। कांग्रेस के विदेश मामलों के विशेषज्ञ ने कहा, “यदि यूरोपीय देशों को यूक्रेन को अरब‑अर्ब पाउंड के ऋण देने की जरूरत है, तो यह सवाल उठता है कि भारत को अपनी विकास योजनाओं के लिये इतनी बड़ी राशि कहाँ से मिलती है? हमारी खुद की वित्तीय कठिनाइयों को देखते हुए, हमें इस तरह के बड़े अंतरराष्ट्रीय ऋण‑सम्बंधित मंचों में भागीदारी का उचित मूल्यांकन करना चाहिए।”

इसके अलावा, वित्त मंत्रालय की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि भारत के मौजूदा ऋण‑सहायता (“न्यू इन्डियन एग्रीमेंट”) यूक्रेन की वित्तीय सहायता में किस हद तक प्रतिदिन प्रभाव डालता है। यह असंगति, नीति‑निर्माताओं से जवाबदेही की मांग को तेज़ कर रही है।

भूराजनीतिक स्तर पर, ब्रिटेन का यह कदम EU‑Ukrainian Loan Scheme को वैधता देने का प्रयास है, जबकि चीन‑रूस के साथ उसके समन्वय को कच्ची तरह से चुनौती देने वाले भारतीय मामलों को अनदेखा कर रहा है। भारतीय टि-टेक, स्टार्ट‑अप और ऊर्जा क्षेत्र की बढ़ती मांगें हैं, और इन क्षेत्रों में विदेश‑से‑विदेश पूँजी प्रवाह को सुनिश्चित करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि यूरोपीय संघ के “सुरक्षित” ऋण में हिस्सा लेना।

सारांश में, यूक्रेन‑ईयू ऋण योजना में ब्रिटेन के प्रवेश का ऐतिहासिक महत्व है, पर यह सवाल भी खड़ा करता है कि भारत इस परिपेक्ष्य में किस दिशा‑निर्देश को अपनाएगा। यदि सरकार सिद्धांतवादी तौर पर “अंतरराष्ट्रीय सहयोग” को प्राथमिकता देती है, तो उसे स्पष्ट नीति‑दृष्टि और पारदर्शी जवाबदेही प्रस्तुत करनी होगी, वरना विरोधी दलों की “परदेशी ऋण घोटाला” के आरोप सिर्फ सैद्धांतिक नहीं रहेंगे।

Published: May 4, 2026