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Category: राजनीति

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बिटएस के मैक्सिकन महल पर प्रदर्शन: सत्ता की लोकप्रियता रणनीति पर सवाल

दक्षिण कोरियाई पॉप समूह बीटीएस ने मैक्सिको सिटी के राष्ट्रीय महल की बालकनी से अपनी आवाज़ सुनाई, जहाँ उन्होंने पाँच घंटे में 50,000 प्रशंसकों को आकर्षित किया। इस आयोजन से पहले उन्होंने राष्ट्रपति क्लाउडिया श्येनबाम से मुलाक़ात की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस प्रकार की सांस्कृतिक सभा सरकारी अनुमोदन के बिना नहीं हो सकती।

श्येनबाम के एक वर्ष से कम समय बाद आयोजित इस कार्यक्रम को उनका प्रशासन अपने ‘नरम शक्ति’ (soft power) को बढ़ाने की रणनीति के रूप में पेश कर रहा है। भारतीय संदर्भ में यह प्रवृत्ति यूँ तो नई नहीं—बीजेपी ने अक्सर बॉलीवुड सितारों, क्रिकेटरों और अब सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को चुनावी मंच पर लाकर ‘जन‑हृदय’ जीतने की कोशिश की है। मैक्सिको में बीटीएस का स्वागत, राष्ट्रभवन की छायाओं में, इस बात का संकेत देता है कि चुनावी माहौल में लोकप्रिय संस्कृति को सरकारी छवि में पिरोना अब एक साधारण PR ट्रिक से आगे बढ़ कर एक औपचारिक राजनयिक कार्य बन चुका है।

परन्तु इस शो के पीछे छिपी वास्तविकताओं पर सवाल उठाना अनिवार्य है। मेक्सिकन विपक्षी दलों ने इस मंच को ‘ध्यान‑भटकाव’ कहा, क्योंकि देश अभी भी उच्च महंगाई, अपराध दर में वृद्धि और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। भारतीय विपक्षी भी इसी तरह के ‘सांस्कृतिक विचलन’ की आलोचना कर रहा है, कि सत्ता में रहने वाले दल लोकप्रिय कलाकारों को मंच देकर वास्तविक नीति‑निर्माण को धूमिल नहीं कर सकते।

संकट में पड़े आर्थिक स्थितियों के बीच, 50,000 लोग एक मंच पर इकट्ठा होना स्वयं में एक असाधारण घटना है, परन्तु इसके साथ जुड़ी सुरक्षा, प्रबंधन और सार्वजनिक खर्च की पारदर्शिता को भी देखा जाना चाहिए। महल की बालकनी पर बीटीएस का प्रदर्शन दर्शाता है कि सॉफ्ट पावर के आकर्षण के पीछे भारी सार्वजनिक धन निवेश हो सकता है, जबकि उसी धन को ग्रामीण स्वास्थ्य या शहरी बुनियादी ढाँचे में लगाना अधिक लाभकारी हो सकता था।

सामाजिक मीडिया पर उत्सव की लहर जरूर तेज़ थी, लेकिन आम नागरिकों की रोज़मर्रा की चिंताओं—सड़कों की हालत, बिजली कटौती, बेरोज़गारी—का अजब‑गजब जाल अब भी बना हुआ है। यह देखना आवश्यक है कि क्या यह राष्ट्रीय महल‑बालकनी के ‘संगीत’ से उत्पन्न अस्थायी उत्साह दीर्घकालिक नीति‑दृष्टि को प्रभावित कर पाएगा या केवल एक क्षणिक खुशी के रूप में क्विक‑फ़िक्स रहेगा।

भविष्य के चुनावी परिदृश्य में, चाहे वह मेक्सिको हो या भारत, लोकप्रिय संस्कृति को राजनीति के मंच पर लाना काफी हद तक व्यवहार्य दिखता है। परन्तु लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांत के साथ इसका मिलन तभी संभव है जब ऐसी सभाएँ वास्तविक विकासात्मक लक्ष्यों के साथ जुड़ी हों, न कि केवल राजदिमाग की ‘फैशन’ बनें। यह सवाल अब सरकार और विपक्ष दोनों के सामने खड़ा है—सांसारिक चमक के पीछे वास्तविक जनहित को कैसे प्राथमिकता दी जाए।

Published: May 7, 2026