बीजेपी ने वासंत विहार में हरित दल की बढ़ती पकड़ रोकने के लिए संघर्ष किया
दक्षिण दिल्ली के वासंत विहार — अपनी आलीशान हवेलियों, निजी डॉक्टरों और उच्च शिक्षित उद्यमियों से घनों घना यह वाक्यांश, अक्सर "सुरक्षित गढ़" का रूपक माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इस अभेद्य क्षेत्र में पर्यावरणवादी समूह हरित संकल्प की लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी है, जिससे राष्ट्रीय पुनःनिर्वाचन को आधार मानती भाजपा को डर सताने लगा है।
वे बुढ़िया-डॉक्टरों, कॉलेज प्रोफेसरों और छोटे व्यवसायी सहयोगियों को फिर से राज़ी करने के लिये, पार्टी के उपमुख्य नेता नवेश कुमार ने स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ एक सैर का आयोजन किया। सैकड़ों कदम गले के पीछे बचे हुए बगीचे और क़ीमती पत्थर की विला-गली में गिनते हुए, उन्होंने मौखिक तौर पर यह कहा – "हमने इन्हें अपना मैदान बना दिया, अब उन्हें अपने घर में स्वागत करना होगा"।
परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह वह कहानी है जहाँ सत्ता के दायरे में नीतियों की व्यावहारिक विफलता स्पष्ट रूप से दिखती है। दिल्ली सरकार के पिछले दो वर्षों में हवा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, जबकि स्वस्थ्य‑सेवा वाले क्षेत्रों में महँगी दवाओं की कीमतें बढ़ी। साथ ही, कचरा प्रबंधन और जल संरक्षण के विषय में कई वादे अधूरे रह गये। इन चूकों को हरित संकल्प ने सूझ‑बूझ से उजागर किया, अपने ‘हरित न्याय’ मंच पर ‘शहरी हरियाली, स्वच्छ हवा और जल‑सुरक्षा’ को प्राथमिकता बनाते हुए चुनते‑चुनते ‘भारी‑वास्तविक’ विकल्प पेश किया।
भाजपा ने तुरंत उत्तर दिया, दावा किया कि उन्होंने पिछले सरकार के दौरान किफायती आवास और बुनियादी सुविधाओं को बढ़ावा दिया है, और अब नई योजना ‘स्वच्छ दिल्ली 2030’ के तहत शहरी हरियाली को दो गुना करने का लक्ष्य है। लेकिन आलोचक इस बात पर इशारा करते हैं कि इन योजनाओं का बजट आवंटन अक्सर बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से अधिक किया गया, जिससे ‘राजनीतिक इशारा‑झटका’ की धारा धुंधली रहती है।
विरोधी दलों की भी इस विकासशील अवस्था को लेकर अलग राय है। कांग्रेस ने कहा कि वासंत विहार जैसा इलाका, जिस पर श्रमिक वर्ग की आवाज़ बहुत कम है, वहाँ सच्ची जमीनी राजनीति की जरूरत है, न कि महँगी घुमावदार भाषण‑बातों की। वहीं, नई उदयशील दल, जैसे पार्टी ‘भारत रीसाइक्लिंग मोवमेंट’ ने कहा कि जल‑संकट और कचरा‑प्रबंधन को हल करने के लिये स्थानीय निकायों से अधिक अधिकारों की माँग करना जरूरी है।
इन सब के बीच मतदाताओं का रवैया अस्पष्ट है। सर्वेक्षणों के अनुसार, वासंत विहार में 70% मतदाता अभी भी भाजपा के प्रति निष्ठावान हैं, परंतु 25% ने इस साल के स्थानीय चुनाव में हरित संकल्प को प्राथमिकता देने की घोषणा की है। यह आंकड़ा एक संकेत हो सकता है कि प्रगतिशील और पर्यावरणसचेत वर्ग, जबकि आर्थिक स्थिरता की चाह रखता है, वह अब भी ऐसे मुद्दों पर संतुलन ढूँढ रहा है, जहाँ सरकार के वादे और वास्तविकता में अंतर स्पष्ट है।
आखिरकार, आगामी विधानसभा चुनाव के नजदीकी आने पर, इस क्षेत्र में चल रही ‘पर्यावरणीय प्रतिद्वंद्विता’ न केवल स्थानीय नीति‑निर्माण को चुनौती देगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा की विकासात्मक विज़न को प्रश्नचिह्न में डाल सकती है। अगर सत्ता और विरोध दोनों ही अपने‑अपने दावों को साबित नहीं कर पाते, तो अंततः नागरिकों को खुद ही उन ‘हरित’ समाधान‑भ्रामक घोषणाओं से जूझना पड़ेगा, जिन्होंने वादे तो किए हैं, पर कार्य नहीं किए।
Published: May 3, 2026