जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: राजनीति

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

फेशियल रिकॉग्निशन की नीति: अधिकारों की कीमत पर सुरक्षा का दावा?

गृह मंत्रालय के एक सदस्य ने हाल ही में कहा कि पुलिस द्वारा स्थापित लाइव फेशियल रिकॉग्निशन कैमरों से "सही अपराधी" ही पहचाने जाएंगे और आम नागरिक को इससे कोई खतरा नहीं होगा। यह बयान तब आया जब उच्च न्यायालय में मानवीय अधिकारों व निजता के आधार पर दायर मुकदमा खारिज कर दिया गया था। संबंधित तकनीक, जापानी कंपनी NEC द्वारा विकसित एआई‑आधारित पहचान सॉफ़्टवेयर, को सरकार ने "डिएनए के बाद अपराधियों को पकड़ने का सबसे बड़ा अग्रिम कदम" कहा है।

परिणामस्वरूप दो प्रमुख सवाल उठते हैं: पहली, क्या ऐसी तकनीक वास्तव में केवल लक्षित अपराधियों को ही पहचान पाती है? दूसरी, गलत पहचान के मामलों में संभावित दुरुपयोग एवं आरक्षित वर्गों पर असमान प्रभाव कितना बड़ा है? पिछले साल ही कई राज्यों में इस तकनीक के प्रयोग से पहचान त्रुटियों की घटनाएँ रिपोर्ट की गई थीं, जिनमें संविदा‑क़ैदियों तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के लोग शामिल थे।

विपक्षी दल और नागरिक समाज के संगठनों ने इस पर तीखी प्रतिक्रया दर्ज की है। वे तर्क देते हैं कि सरकार द्वारा तकनीक को "अपराधी‑सुरक्षा" के ढांचे में पेश करना, न्यायिक निगरानी को धोखा देने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि बिना पारदर्शी नियमावली, स्वतंत्र ऑडिट और सार्वजनिक बहस के इस तकनीक को व्यापक रूप से लागू किया जाना लोकतांत्रिक संस्थाओं के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

वहीं, सरकार का तर्क है कि विशाल डेटा सेंटरों में संग्रहित चेहरों की बायो‑मेट्रिक जानकारी प्रयोग करके अपराध की रोकथाम में तेज़ी लाई जा सकती है। लेकिन आलोचक बताते हैं कि इस प्रकार का निरन्तर निगरानी नेटवर्क निजता के मौलिक अधिकार को क्षीण कर सकता है, और जब तक अद्यतन विधायी ढाँचा नहीं बनता, तब तक “समझौता” शब्द ही लागू नहीं रहेगा।

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में, आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र, इस मुद्दे को विपक्ष द्वारा "नागरिक अधिकारों की लड़ाई" के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं, सरकार को यह साबित करना होगा कि तकनीक के प्रयोग से न केवल अपराध दर घटेगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी बरकरार रहेगा। इस बीच, सार्वजनिक हित की चिंता बनी रहती है कि मौजूदा प्रणाली में त्रुटिपूर्ण पहचान के कारण निर्दोष लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने की संभावना कितनी वास्तविक है।

सारांश में, फेशियल रिकॉग्निशन के बारे में सरकार का उत्साह और न्यायालयी फैसले का विरोधाभास एक गहरा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। यह स्पष्ट है कि बिना पर्याप्त निगरानी, डेटा सुरक्षा और पारदर्शी उत्तरदायित्व के, तकनीकी लहर के साथ चलना लोकतांत्रिक नियंत्रण को कमजोर कर सकता है। भविष्य में इसकी सफलता या विफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विधायी प्रक्रिया नागरिक अधिकारों को कैसे संतुलित करती है।

Published: May 7, 2026